Amiri Ki Chabi Aapke Haath Mein Pdf / अमीरी की चाबी आपके हाथ में pdf

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Amiri Ki Chabi Aapke Haath Mein Pdf Download

 

 

पुस्तक का नाम Amiri Ki Chabi Aapke Haath Mein Pdf
पुस्तक के लेखक नेपोलियन हिल
भाषा हिंदी
फोर्मेट Pdf
साइज 1723 Kb
पृष्ठ 142
श्रेणी व्यक्तित्व विकास

 

 

 

 

Amiri Ki Chabi Aapke Haath Mein Pdf
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प्रताप रघु से बोले रघु भाई सुधीर और रजनी का व्यवसाय बहुत ही बढ़िया चल रहा है इन्हे और ज्यादा जिम्मेदारी देकर परेशान नहीं करना चाहिए। रघु बोले आप ठीक कह रहे है लेकिन बंगलोर में आपका व्यवसाय कौन देखेगा? फिर रघु ने ही खुद उत्तर भी दिया नरेश और विवेक से मुझे बात करनी होगी आज ही इसी समय।

 

 

 

 

रघु और प्रताप आकर बैठे ही थे कि विवेक के साथ नरेश भी आ गया था और आते ही प्रताप और रघु को दोनों ने प्रणाम किया। प्रताप ने बिना किसी भूमिका के पूछा आप लोग इस समय क्या कर रहे है। नरेश बोला इस समय हम लोग बी. एस. सी. की पढ़ाई पूरा करके डाक्टर की पढ़ाई के लिए आगरा जाने के लिए सोच रहे है।

 

 

 

 

प्रताप बोले फिर डाक्टर बनने के बाद आप लोगो का क्या उद्देश्य है। विवेक बोला कि आपके जैसा हम लोग भी बेसहारा आदमियों की सेवा करना चाहते है। उसी समय रघुराज बोले मनुष्य के विचार यदि अच्छे हो तो किसी भी माध्यम से अनाथ लोगो की सेवा किया जा सकता है।

 

 

 

 

विवेक बोला आप स्पष्ट रूप से कहिए पिता जी। रघु बोले यह प्रताप भाई तुम दोनों को ही अपनी कम्पनी का व्यवस्थापक नियुक्त करना चाहते है जिसके माध्यम से तुम लोग बेसहारा लोगो की भली-भांति सेवा कर सकते हो। रगू फिर बोले तुम लोग बी. एस. सी. पूर्ण कर चुके हो।

 

 

 

 

आगे की पढ़ाई में जितना समय लगाओगे उतने ही समय में तुम लोग बंगलोर में कम्पनी की पूरी व्यवस्था संभाल सकते हो। विवेक और नरेश दोनों ने कहा आप लोग हमे थोड़ा सा समय दीजिए। तभी प्रताप भारती बोले मैं कल बंगलोर चला जाऊंगा आप लोग अपना निर्णय रघु भाई को ही बता देना।

 

 

 

 

नरेश और विवेक दोनों अपनी बी. एस. सी. की पढ़ाई पूरी कर चुके थे और आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें आगरा जाना था। वहां दो साल की पढ़ाई के बाद वह दोनों डाक्टर बन जाते लेकिन एक कहावत है कि निज चेती होती नहीं एक दिन रघुराज के पास प्रताप भारती का फोन आया था। 

 

 

 

 

कुशल-क्षेम के बाद प्रताप भारती ने कहा रघु मैं कल गंगापुर आ रहा हूँ। रघुराज ने कहा कि आप अवश्य ही आइये। दूसरे दिन शाम को प्रताप गंगापुर पहुँच गए थे। वह गंगापुर से सीधे विंदकी आ गए थे रघु तो उनका ही इंतजार कर रहा था।

 

 

 

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