Atharva Veda in Hindi Pdf / अथर्व वेद हिंदी Pdf Download

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

वहां एक महान दिव्य आश्रम था जो अनेक प्रकार की शोभा से सुशोभित था। दिव्यदर्शी नारद जी तपस्या करने के लिए उसी आश्रम में गए। उस गुफा को देखकर मुनिवर नारद जी बड़े प्रसन्न हुए और सुदीर्घ काल तक वहां तपस्या करते रहे। उनका अंतःकरण शुद्ध था।

 

 

 

 

वे दृढ़तापूर्वक आसन बांधकर मौन हो प्राणायाम पूर्वक समाधि में स्थित हो गए। ब्राह्मणो! उन्होंने वह समाधि लगाई जिसमे ब्रह्मा का साक्षात्कार कराने वाला अहं ब्रह्मास्मि यह ज्ञान प्रकट होता है। मुनिवर नारद जी जब इस प्रकार तपस्या करने लगे उस समय यह समाचार पाकर देवराज इंद्र काँप उठे।

 

 

 

 

वे मानसिक संताप से विह्वल हो गए। वे नारद मुनि मेरा राज्य लेना चाहते है। मन ही मन ऐसा सोचकर इंद्र ने उनकी तपस्या में विघ्न डालने के लिए प्रयत्न करने की इच्छा की। उस समय देवराज ने अपने मन से कामदेव का स्मरण किया। स्मरण करते ही कामदेव आ गए।

 

 

 

 

महेंद्र ने उन्हें नारद जी की तपस्या में विघ्न डालने का आदेश दिया। यह आज्ञा पाकर कामदेव बसंत को साथ ले बड़े गर्व से उस स्थान पर गए और अपना उपाय करने लगे। उन्होंने वहां शीघ्र ही अपनी सारी कलाये रच डाली। बसंत ने भी मदमत्त होकर अपना प्रभाव अनेक प्रकार से प्रकट किया।

 

 

 

 

मुनिवरो! कामदेव और बसंत के अथक प्रयत्न करने पर भी नारद मुनि के चित्त में विकार नहीं उत्पन्न हुआ। महादेव जी के अनुग्रह से उन दोनों का गर्व चूर्ण हो गया। शौनक आदि महर्षियो! ऐसा होने में जो कारण था उसे आदर पूर्वक सुनो। महादेव जी की कृपा से ही नारद मुनि पर कामदेव का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

 

 

 

 

पहले उसी आश्रम में कामसुत्र भगवान शिव ने उत्तम तपस्या की थी और वही उन्होंने मुनियो की तपस्या का नाश करने वाले कामदेव को शीघ्र ही भस्म कर डाला था। उस समय रति ने कामदेव को पुनः जीवित करने के लिए देवताओ से प्रार्थना की थी।

 

 

 

 

तब देवताओ ने समस्त लोको का कल्याण करने वाले शंकर भगवान से याचना की। उनके याचना करने पर वे बोले – देवताओ! कुछ समय व्यतीत होने की बाद कामदेव जीवित हो जायेंगे परन्तु यहां उनका कोई भी उपाय नहीं चल सकेगा।

 

 

 

 

अपरगण यहां खड़े होकर लोग चारो ओर जितनी दूर तक की भूमि को नेत्र से देख पाते हो वहां तक कामदेव के बाणों का प्रभाव नहीं चल सकेगा इसमें संशय नहीं है। भगवान शंकर की इस उक्ति के अनुसार उस समय वहां नारद जी के प्रति कामदेव का निजी प्रभाव मिथ्या सिद्ध हुआ।

 

 

 

 

वे शीघ्र ही स्वर्गलोक में इंद्र के पास लौट गए। वहां कामदेव ने अपना सारा वृतांत और मुनि का प्रभाव कह सुनाया। तत्पश्चात इंद्र की आज्ञा से वे बसंत के साथ अपने स्थान को लौट गए। उस समय देवराज इंद्र को बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने नारद जी की भूरि-भूरि प्रसंशा की।

 

 

 

 

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