Chandragupt Natak Jayashankar Prasad Pdf

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पुस्तक का नाम  Chandragupt Natak Jayashankar Prasad Pdf
पुस्तक के लेखक  जयशंकर प्रसाद 
भाषा  हिंदी 
फॉर्मेट  Pdf 
साइज  6.45 Mb 
पृष्ठ  282 
श्रेणी  नाटक 

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

 

उसका साधन कठिन है और उसमे मन के लिए कोई आधार नहीं है। बहुत कष्ट करने पर कोई उसे प्राप्त कर भी लेता है तो वह भी भक्ति रहित होने से मुझको प्रिय नहीं होता। भक्ति स्वतंत्र है और सब सुखो का भंडार है। परन्तु संतो के संग के बिना प्राणी इसे नहीं प्राप्त कर सकते है और पुण्य समूह के बिना संत नहीं मिलते।

 

 

 

 

सत्संगित ही जन्म-मरण के चक्र का अंत करती है। जगत में पुण्य केवल एक है उसके समान दूसरा नहीं है। वह है – मन, कर्म और वचन से ब्राह्मणो के चरणों की पूजा करना। जो कपट त्याग करके ब्राह्मणो की सेवा करता है। उस पर मुनि और देवता प्रसन्न रहते है।

 

 

 

 

और भी एक गुप्त मत है मैं उसे सबसे हाथ जोड़कर कहता हूँ कि शंकर जी के भजन के बिना मनुष्य मेरी भक्ति नहीं प्राप्त कर सकता है।

 

 

 

 

कहो तो, भक्ति मार्ग में कौन सा परिश्रम है? इसमें न योग की आवश्यकता है। न यज्ञ, जप, तप और उपवास की। यहां इतना ही आवश्यक है कि सरल स्वभाव हो, मन में कुटिलता न हो और जो कुछ भी मिले उसमे ही सदा संतोष रखे। मेरा दास कहलाकर यदि कोई मनुष्यो की आशा करता है तो तुम्ही कहो उसका क्या विश्वास है।

 

 

 

 

 

अर्थात उसकी आस्था मुझपर बहुत ही निर्बल है। बहुत बात बढ़ाकर क्या कहूं? हे भाइयो! मैं तो इसी आचरण के वश में हूँ। न किसी से बैर करे, न लड़ाई झगड़ा करे, न आशा रखे न भय करे। उसके लिए सभी दिशाए सदा सुखमयी है। जो कोई भी फल की इच्छा से कर्म नहीं करता है जिसकी घर में ममता नहीं है।

 

 

 

 

हे नाथ! न तो मुझे कुछ संदेह है और न स्वप्न में भी शोक और मोह है। हे कृपा और आनंद के समूह! यह केवल आपकी कृपा का ही फल है।

 

 

 

 

तथापि हे कृपानिधान! मैं आपसे एक धृष्टता करता हूँ। मैं सेवक हूँ और आप सेवक को सुख देने वाले है। इससे मेरी धृष्टता को क्षमा करिये और मेरे प्रश्न का उत्तर देकर सुख प्रदान करिये। हे रघुनाथ जी! वेद-पुराणों ने बहुत प्रकार से संतो की महिमा का गायन किया है। आपने भी अपने मुख से उनकी बड़ाई किया है और उनपर प्रभु आपका प्रेम भी बहुत है। हे प्रभो! मैं उनके लक्षण सुनना चाहता हूँ। आप कृपा के सागर है और गुण तथा ज्ञान में अत्यंत निपुण है।

 

 

 

 

हे शरणागत का पालन करने वाले! संत और असंत के भेद अलग-अलग करके मुझको समझाकर कहिए। श्री राम जी ने कहा – हे भाई! संतो के लक्षण असंख्य है, जो वेद और पुराणों में प्रसिद्ध है। संत और असन्तो की करनी ऐसी है जैसे लकड़हारे और चंदन का होता है। हे भाई! सुनो, लकड़हारा चंदन के वृक्ष को हानि पहुंचाता है किन्तु चंदन का वृक्ष अपने स्वभाव वश अपना गुण उस लकड़हारे को सुगंध से सुवासित कर देता है।

 

 

 

 

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