Best Durga Saptashati Pdf in Hindi / दुर्गा सप्तशती Pdf

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Durga Saptashati Pdf in Hindi  

 

 

 

पुस्तक का नाम  Durga Saptashati Pdf in Hindi
पुस्तक के लेखक  रामनारायण दत्त
श्रेणी  धार्मिक 
साइज  606.9 KB
पृष्ठ  240
फॉर्मेट  Pdf
भाषा  हिंदी 

 

 

दुर्गा सप्तशती pdf free download

Durga Saptshati Adhyay 12 Pdf

 

 

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दुर्गा सप्तशती के बारे में ( Durga Saptashati Pdf in Hindi )

 

 

Durga Saptashati Pdf in Hindi
Durga Saptashati Pdf in Hindi

 

 

 

ॐ विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां
कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम्।
हस्तैश्‍चक्रगदासिखेटविशिखांश्‍चापं गुणं तर्जनीं
बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे॥

 

 

ॐ देव्युवाच॥१॥
एभिः स्तवैश्‍च मां नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः।
तस्याहं सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम्॥२॥

 

 

मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम्।
कीर्तयिष्यन्ति ये तद्वद् वधं शुम्भनिशुम्भयोः॥३॥

 

 

अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां चैकचेतसः।
श्रोष्यन्ति चैव ये भक्त्या मम माहात्म्यमुत्तमम्॥४॥

 

 

न तेषां दुष्कृतं किञ्चिद् दुष्कृतोत्था न चापदः।
भविष्यति न दारिद्र्यं न चैवेष्टवियोजनम्॥५॥

 

 

शत्रुतो न भयं तस्य दस्युतो वा न राजतः।
न शस्त्रानलतोयौघात्कदाचित्सम्भविष्यति॥६॥

 

 

तस्मान्ममैतन्माहात्म्यं पठितव्यं समाहितैः।
श्रोतव्यं च सदा भक्त्या परं स्वस्त्ययनं हि तत्॥७॥

 

 

उपसर्गानशेषांस्तु महामारीसमुद्भवान्।
तथा त्रिविधमुत्पातं माहात्म्यं शमयेन्मम॥८॥

 

 

यत्रैतत्पठ्यते सम्यङ्‌नित्यमायतने मम।
सदा न तद्विमोक्ष्यामि सांनिध्यं तत्र मे स्थितम्॥९॥

 

 

बलिप्रदाने पूजायामग्निकार्ये महोत्सवे।
सर्वं ममैतच्चरितमुच्चार्यं श्राव्यमेव च॥१०॥

 

 

जानताऽजानता वापि बलिपूजां तथा कृताम्।
प्रतीच्छिष्याम्यहं प्रीत्या वह्निहोमं तथा कृतम्॥११॥

 

 

शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी।
तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः॥१२॥

 

 

सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः॥१३॥

 

 

श्रुत्वा ममैतन्माहात्म्यं तथा चोत्पत्तयः शुभाः।
पराक्रमं च युद्धेषु जायते निर्भयः पुमान्॥१४॥

 

 

रिपवः संक्षयं यान्ति कल्याणं चोपपद्यते।
नन्दते च कुलं पुंसां माहात्म्यं मम शृण्वताम्॥१५॥

 

 

शान्तिकर्मणि सर्वत्र तथा दुःस्वप्नदर्शने।
ग्रहपीडासु चोग्रासु माहात्म्यं शृणुयान्मम॥१६॥

 

 

उपसर्गाः शमं यान्ति ग्रहपीडाश्‍च दारुणाः।
दुःस्वप्नं च नृभिर्दृष्टं सुस्वप्नमुपजायते॥१७॥

 

 

बालग्रहाभिभूतानां बालानां शान्तिकारकम्।
संघातभेदे च नृणां मैत्रीकरणमुत्तमम्॥१८॥

 

 

दुर्वृत्तानामशेषाणां बलहानिकरं परम्।
रक्षोभूतपिशाचानां पठनादेव नाशनम्॥१९॥

 

 

सर्वं ममैतन्माहात्म्यं मम सन्निधिकारकम्।
पशुपुष्पार्घ्यधूपैश्‍च गन्धदीपैस्तथोत्तमैः॥२०॥

 

 

विप्राणां भोजनैर्होमैः प्रोक्षणीयैरहर्निशम्।
अन्यैश्‍च विविधैर्भोगैः प्रदानैर्वत्सरेण या॥२१॥

 

 

प्रीतिर्मे क्रियते सास्मिन् सकृत्सुचरिते श्रुते।
श्रुतं हरति पापानि तथाऽऽरोग्यं प्रयच्छति॥२२॥

 

 

रक्षां करोति भूतेभ्यो जन्मनां कीर्तनं मम।
युद्धेषु चरितं यन्मे दुष्टदैत्यनिबर्हणम्॥२३॥

 

 

तस्मिञ्छ्रुते वैरिकृतं भयं पुंसां न जायते।
युष्माभिः स्तुतयो याश्‍च याश्‍च ब्रह्मर्षिभिःकृताः॥२४॥

 

 

ब्रह्मणा च कृतास्तास्तु प्रयच्छन्ति शुभां मतिम्।
अरण्ये प्रान्तरे वापि दावाग्निपरिवारितः॥२५॥

 

 

दस्युभिर्वा वृतः शून्ये गृहीतो वापि शत्रुभिः।
सिंहव्याघ्रानुयातो वा वने वा वनहस्तिभिः॥२६॥

 

 

राज्ञा क्रुद्धेन चाज्ञप्तो वध्यो बन्धगतोऽपि वा।
आघूर्णितो वा वातेन स्थितः पोते महार्णवे॥२७॥

 

 

पतत्सु चापि शस्त्रेषु संग्रामे भृशदारुणे।
सर्वाबाधासु घोरासु वेदनाभ्यर्दितोऽपि वा॥२८॥

 

 

स्मरन्ममैतच्चरितं नरो मुच्येत संकटात्।
मम प्रभावात्सिंहाद्या दस्यवो वैरिणस्तथा॥२९॥
दूरादेव पलायन्ते स्मरतश्‍चरितं मम॥३०॥

 

 

ऋषिरुवाच॥३१॥
इत्युक्त्वा सा भगवती चण्डिका चण्डविक्रमा॥३२॥

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

भगवान ने अमृत के समान यह वाणी कहकर सबको सुखी किया कि तुम्हारे बल से ही इस प्रबल शत्रु का अंत हो सका और विभीषण ने राज्य प्राप्त किया।

 

 

 

इस कारण से तुम्हारा यश नित्य ही तीनो लोक में नया बना रहेगा। जो लोग मेरे सहित तुम्हारी शुभ कीर्ति को परम प्रेम के साथ गाएंगे वह बिना परिश्रम के ही अपार संसार से पार हो जायेंगे।

 

 

 

106- दोहा का अर्थ-

 

 

 

प्रभु के वचन सुनकर वानर समूह तृप्त नहीं होते। वह सब बार-बार सिर नवाते है और चरण कमल को पकड़ते है।

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

फिर प्रभु ने हनुमान जी को बुला लिया। भगवान ने कहा – तुम लंका जाओ। जानकी को सब समाचार सुनाओ और उनका कुशल समाचार लेकर तुम चले आओ।

 

 

 

तब हनुमान जी नगर में आये। यह सुनकर राक्षस राक्षसी उनके सत्कार के लिए दौड़े। उन्होंने बहुत प्रकार से हनुमान जी की पूजा किया और फिर श्री जानकी जी को दिखला दिया।

 

 

 

 

हनुमान जी ने सीता जी को दूर से ही प्रणाम किया। जानकी जी ने पहचान लिया कि यह वही रघुनाथ जी का दूत है और पूछा – हे तात! कहो, कृपा के धाम मेरे प्रभु छोटे भाई और वानरों की सेना सहित कुशल से तो है?

 

 

 

हनुमान जी ने कहा – हे माता! कोशलपति श्री राम जी सब प्रकार से सकुशल है। उन्होंने संग्राम में दशशीश को जीत लिया है और विभीषण ने अचल राज्य प्राप्त किया है। हनुमान जी के वचन सुनकर सीता जी हर्षित हो उठी।

 

 

 

छंद का अर्थ-

 

 

श्री जानकी जी के हृदय में अत्यंत हर्ष हुआ। उनका शरीर पुलकित हो गया और नयन में आनंद का जल भर गया। वह बार-बार कहती है – हे हनुमान! मैं तुझे क्या दूँ? इस समाचार के समान तीनो लोक में कुछ भी नहीं है।

 

 

 

हनुमान जी ने कहा – हे माता! सुनिए, मैंने निःसंदेह आज सारे जगत का राज्य प्राप्त कर लिया जो मैं रण में शत्रु सेना को जीतकर भाई सहित निर्विकार श्री राम जी को देख रहा हूँ।

 

 

 

107- दोहा का अर्थ-

 

 

जानकी जी ने कहा – हे पुत्र! सुन, समस्त सद्गुण तेरे हृदय में वास करे और हे हनुमान! लक्ष्मण जी सहित कोशलपति प्रभु सदा तुझ पर प्रसन्न रहे।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

हे तात! अब तुम वही उपाय करो जिससे मैं इन नयनो से प्रभु के कोमल श्याम शरीर के दर्शन करूँ। तब श्री राम जी के पास जाकर हनुमान जी ने जानकी का कुशल समाचार सुनाया।

 

 

 

सूर्य कुल भूषण श्री राम जी ने संदेश सुनकर अंगद और विभीषण को बुला लिया और कहा – पवनपुत्र हनुमान के साथ जाओ और जानकी जी को आदर के साथ ले आओ।

 

 

 

वह सब तुरंत ही वहां गए जहां सीता जी थी। सब रक्षिसियां विनीत होकर उनकी सेवा कर रही थी। विभीषण जी ने शीघ्र ही उन लोगो को समझा दिया।

 

 

 

उन्होंने सीता जी को स्नान करवाया। बहुत प्रकार के गहने पहनाकर फिर वह सब एक सुंदर पालकी सजाकर लाये। सीता जी प्रसन्न होकर सुखधाम प्रियतम श्री राम जी का स्मरण करके उसपर हर्ष के साथ चढ़ी। .

 

 

 

चारो तरफ से हाथो में छड़ी लेकर रक्षक चले। सबके मन में परम उल्लास है। रीछ-वानर सब दर्शन करने के लिए आये। तब रक्षक क्रोध करके उनको रोकने दौड़े। श्री रघुवीर ने कहा – हे मित्र! मेरा कहना मानो और सीता को पैदल ही ले आओ जिससे वानर उनको माता की तरह देखे।

 

 

 

गोसाई श्री राम जी ने हंसकर ऐसा कहा। प्रभु के वचन सुनकर रीछ-वानर हर्षित हो गए। आकाश से देवताओ ने फूल बरसाए सीता जी के असली स्वरुप को पहले अनल में रखा था। अब भीतर के साक्षी भगवान उनको प्रकट करना चाहते है।

 

 

 

108- दोहा का अर्थ-

 

 

इसी कारण से करुणासागर श्री राम जी ने लीला मात्र से कुछ कटु वचन कहे – जिन्हे सुनकर सब रक्षिसियां विषाद करने लगी।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

प्रभु के वचन को शिरोधार्य करके मन, वचन और धर्म से पवित्र सीता जी बोली – हे लक्ष्मण! तुम मेरे धर्माचरण मे सहायक बनो और तुरंत ही तुम अनल प्रकट करो।

 

 

 

सीता जी का विरह, विवेक, धर्म और नीति से पूर्ण वाणी सुनकर लक्ष्मण जी की नयन में विषाद का जल भर गया। वह दोनों हाथ जोड़कर खड़े रहे। वह भी प्रभु से कुछ कह नहीं सकते।

 

 

 

फिर श्री राम जी का रुख देखकर लक्ष्मण जी दौड़े और अनल तैयार करने के लिए बहुत सी लकड़ी ले आये। अनल को बढ़ा हुआ देखकर जानकी जी के हृदय में हर्ष हुआ उन्हें कुछ भी भय नहीं हुआ।

 

 

 

सीता जी ने कहा – यदि मन, वचन और कर्म से मेरे हृदय में श्री रघुवीर को छोड़कर अन्य किसी का आश्रय नहीं है तो हे अनल! मेरे मन की गति जानकर मेरे लिए चंदन के समान शीतल हो जाये।

 

 

 

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