Gaban Upanyas Pdf / गबन उपन्यास Pdf Download

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Gaban Upanyas Pdf Download

 

 

 

पुस्तक का नाम  गबन उपन्यास Pdf
पुस्तक के लेखक  प्रेमचंद 
भाषा  हिंदी 
फॉर्मेट  Pdf 
साइज  90.34 Mb 
श्रेणी  साहित्य 
पृष्ठ  309 

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

 

उन मनुष्यो में भी द्विज और द्विज में भी वेद को कंठ में धारण करने वाले, उनमे भी वेदोक्त धर्म पर चलने वाले, उनमे भी विरक्त तथा वैराग्यवान मुझे प्रिय है। वैराग्यवानो में फिर ज्ञानी और ज्ञानियों से भी अत्यंत प्रिय विज्ञानी है। विज्ञानियों से भी प्रिय मुझे अपना दास है जिसे मेरा ही आश्रय है उसे कोई दूसरी आशा नहीं है।

 

 

 

 

मैं तुझसे बार-बार सत्य ‘निज सिद्धांत’ कहता हूँ कि मुझे अपने सेवक के समान कोई भी प्रिय नहीं है। भक्तिहीन ब्रह्मा ही क्यों न हो वह मुझे सब जीवो के समान ही प्रिय है। परन्तु भक्तिमान अत्यंत नीच प्राणी भी मुझे प्राणो के समान प्रिय है यह मेरी घोषणा है।

 

 

 

 

पवित्र, सुशिल और सुंदर बुद्धि वाला सेवक बताओ किसको प्यारा नहीं लगता? वेद और पुराण यही नीति कहते है। हे काक! सावधान होकर सुन।

 

 

 

 

एक पिता के बहुत से पुत्र पृथक-पृथक गुण, स्वभाव और आचरण वाले होते है। कोई पंडित, कोई तपस्वी, कोई ज्ञानी, कोई धनी, कोई शूरवीर, कोई दानी होता है। कोई सर्वज्ञ, कोई धर्म परायण होता है। इन सभी पर पिता का समान प्रेम होता है। परन्तु यदि इनमे से यदि कोई मन वचन और कर्म से पिता का ही भक्त होता है स्वप्न में भी दूसरा धर्म नहीं जानता है।

 

 

 

 

वह पुत्र पिता को प्राणो के समान प्रिय होता है यद्यपि वह सब प्रकार से अज्ञान ही क्यों न हो। इस प्रकार तिर्यक (पशु-पक्षी) देव, मनुष्य और असुरो समेत जितने भी चेतन और जड़ जीव है। उनसे भरा हुआ यह सम्पूर्ण विश्व मेरा ही पैदा किया हुआ है। अतः सब पर मेरी बराबर दया है। परन्तु इनमे से जो मद और माया को छोड़कर मन, वचन और शरीर से मुझे ही भजता है।

 

 

 

 

वह पुरुष हो नपुंसक हो स्त्री हो अथवा चर-अचर कोई भी जीव हो कपट छोड़कर जो भी सर्वभाव से मुझे भजता है वही मुझको परम प्रिय है। हे पक्षी! मैं तुझसे सत्य कहता हूँ पवित्र सेवक मुझे प्राणो के समान प्रिय है। ऐसा विचारकर सब आशा-भरोसा छोड़कर मुझको ही भज।

 

 

 

 

तुझे काल कभी नहीं व्यापेगा। निरंतर मेरा भजन और स्मरण करते रहना। प्रभु के वचनामृत सुनकर मैं तप्त नहीं होता था। मेरा शरीर पुलकित था मैं मन में अत्यंत हर्षित हो रहा था। वह सुख मन और श्रवन ही जानते है। जीभ से उनकी बड़ाई नहीं हो सकती है। प्रभु की शोभा का वह सुख नयन ही जानते है पर वह कहेंगे कैसे? उनकी वाणी तो नहीं है।

 

 

 

 

 

मुझे बहुत प्रकार से समझाकर और सुख देकर फिर वही बालको के खेल करने लगे। नयन में जल भरकर और मुख को कुछ रुखा सा बनाकर उन्होंने माता की ओर देखा कि बहुत भूख लगी है। यह देखकर माता तुरंत उठ दौड़ी और कोमल वचन कहकर उन्होंने श्री राम जी को छाती से लगा लिया वह गोद में लेकर दुग्ध पान कराने लगी और श्री रघुनाथ जी की ललित लीलाये गाने लगी।

 

 

 

 

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