Ganpati Atharva Shirsha Pdf / गणपति अथर्व शीर्ष Pdf

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

इसी साल वह बड़े बाबू के छोटे सुपुत्र को छः महीने तक बिना नागा किए पढ़ाते रहे अब वह और क्या करे। किसी संयोग से राजेश को ऐसा सुनहरा मौका मिल गया मगर हर किसी को ऐसे अवसर नहीं मिलते है। वह अवश्य ही पता लगाने की कोशिस करेंगे कि राजेश को वास्तव में ढाई हजार रूपये मिलते है या महज डींग है।

 

 

 

 

अगर राजेश को ढाई हजार रुपये मिलते है तो प्रिया को क्या हक है कि वह उन्हें ताने दे। प्रिया रुपवती है, सुंदर है, मृदुभाषिणि है, त्याग की मूर्ति है लेकिन उससे बढ़कर त्यागमयी, मृदुभाषिणी और सुंदरी देवियो से यह दुनिया खाली नहीं है।

 

 

 

 

अगर इसी तरह वह भी प्रिया से ज्यादा रूपवती और सुशीला रमणी को देखकर उसे कड़वी बाते कहते हुए कोसना शुरू कर दे तो उसे कैसा लगेगा तो क्या वह प्रिया का अनादर करने लगे? अब दोनों को एक दूसरे के गुण और दोष मालूम हो गए है अब तो संतोषपूर्ण जीवन में ही उनका जीवन सुखमय हो सकता है।

 

 

 

 

मगर प्रिया समझदार होकर भी इतनी मोटी सी बात नहीं कह सकती है। एक समय वह भी था जब उसकी नजरो में प्रिया से ज्यादा रमणी संसार में न थी लेकिन उन्माद कब का शांत हो गया। भावुकता के संसार से वास्तविक जीवन में आये उन्हें एक युग बीत गया।

 

 

 

 

अब तो विवाहित जीवन को अनुभव और संतोष के सामंजस्य से ही चलाना है। अपनी बहन की ठाट देखकर एक क्षण के लिए प्रिया के मन में ऐसे निराशाजनक, अन्यायपूर्ण दुखद भावो का उठना स्वाभाविक है। प्रिया को सन्यासी तो नहीं और न ही वैरागिनी है कि हर एक दशा में अविचलित रहे।

 

 

 

 

फिर भी नरेंद्र को प्रिया से सहानुभूति थी। वह एक उदार प्रवृत्ति के आदमी थे और एक कल्पनाशील भी। उन्होंने प्रिया की कटु बातो का कुछ भी जवाब नहीं दिया उसे शर्बत की तरह पी गए। नरेंद्र अपने मन को समझाकर शांत किया और राजेश के विषय में तहकीकात करने का निश्चय किया।

 

 

 

 

एक सप्ताह तक प्रिया मानशिक अशांत की दशा में थी। वह प्रत्येक बात पर झुंझलाती थी। बच्चो को डांटती थी कोसते हुए अपने नसीब को रोती रहती। दोनों बच्चे अपनी मां से बात करने में भी डरते थे और नरेंद्र तो प्रिया के साये से डरकर भागते थे।

 

 

 

 

जो कुछ उन्हें थाली में आ जाता उसे अपने पेट में डाल लेते और दफ्तर चले जाते। दफ्तर से आने के बाद दोनों बच्चो को साथ लेकर कही घूमने निकल जाते। घर का काम तो करना ही पड़ता था लेकिन प्रिया को अब उसमे आनंद नहीं मिलता था।

 

 

 

 

घर की जिन पुरानी हो गयी सामानों से उसका आत्मीय संबंध हो गया था। जिनकी सफाई और सजावट में वह व्यस्त रहा करती थी अब उनकी तरफ आँख उठाकर न देखती थी उन्हें बेकार सी टालती थी। घर में एक ही खिदमतगार था। उसने जब देखा बहू जी घर की तरफ से खुद ही लापरवाह है तो उसे क्या गरज थी कि सफाई करता।

 

 

 

 

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