Gunaho Ka Devta Pdf / गुनाहो का देवता Pdf

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Gunaho Ka Devta Pdf Download

 

 

पुस्तक का नाम  Gunaho Ka Devta Pdf
पुस्तक के लेखक  धर्मवीर भारती 
फॉर्मेट  Pdf 
भाषा  हिंदी 
साइज  10.24 Mb 
पृष्ठ  389 
श्रेणी  उपन्यास 

 

 

 

Gunaho Ka Devta Pdf
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सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

 

मनुष्य मोह वश स्वार्थ परायण होकर अनेक पाप करते है इससे ही उनका परलोक नष्ट हुआ रहता है। हे भाई! मैं उनके लिए कालरूप हूँ और उनके अच्छे बुरे कर्मो का यथायोग्य फल देने वाला हूँ। ऐसा विचारकर जो परम चतुर है वह संसार के प्रवाह को दुःख रूप जानकर मुझे ही भजते है।

 

 

 

 

इससे ही वह शुभ और अशुभ फल देने वाले कर्मो को त्यागकर देवता, मनुष्य और मुनिनायक के रूप में मुझको भजते है। इस प्रकार मैंने संतो और असन्तो के गुण कहे। जिन लोगो ने इन गुणों को समझ रखा है वह जन्म-मरण के चक्कर में नहीं पड़ते है।

 

 

 

 

हे तात! सुनो, माया से रचे हुए ही अनेक सब गुण और दोष है इनकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। गुण, विवेक इसी में है कि दोनों ही न देखे जाय इन्हे देखना ही अविवेक है।

 

 

 

 

भगवान के श्री मुख से यह वचन सुनकर सब भाई हर्षित हो गए। प्रेम उनके हृदय में नहीं समाता। वह बार-बार बहुत ही विनती करते है। विशेषकर हनुमान जी के हृदय में अपार हर्ष है। तदनन्तर श्री राम जी अपने महल को गए। इस प्रकार वह नित्य नयी लीला करते है।

 

 

 

 

नारद मुनि अयोध्या में बार-बार आकर श्री रीम जी के पवित्र चरित्र गाते है। मुनि यहां से नित्य नए-नए चरित्र देखकर जाते है और ब्रह्मलोक में जाकर सब कथा कहते है। ब्रह्मा जी  सुनकर अत्यंत सुख मानते है और कहते है – हे तात! बार-बार श्री राम जी के गुणों का गान करो।

 

 

 

 

सनकादि मुनि नारद जी की सराहना करते है यद्यपि वह सनकादि मुनि ब्रह्म निष्ठ है। परन्तु श्री राम जी का गुणगान सुनकर वह भी अपनी ब्रह्म समाधि को भूल जाते है और आदर पूर्वक उसे सुनते है। वह राम कथा सुनने के श्रेष्ठ अधिकारी है।

 

 

 

 

सनकादि मुनि जैसे जीवन मुक्त और ब्रह्म निष्ठ पुरुष भी ध्यान, ब्रह्म समाधि छोड़कर श्री राम जी के चरित्र सुनते है। यह जानकर भी जो श्री हरि की कथा से प्रेम नहीं करते है उनके हृदय सचमुच ही पत्थर के समान है।

 

 

 

 

एक बार श्री रघुनाथ जी के बुलाए हुए गुरु वशिष्ठ जी, ब्राह्मण और अन्य सब सज्जन यथायोग्य बैठ गए, तब भक्तो के जन्म-मरण को मिटाने वाले श्री राम जी वचन बोले – हे समस्त नगरवासियो! मेरी बात सुनिए। यह बात मैं हृदय में ममता लाकर नहीं कहता हूँ। न अनीति की बात कहता हूँ और न इसमें कुछ प्रभुता है।

 

 

 

इसलिए संकोच, भय छोड़कर ध्यान देकर मेरी बातो को सुन लो यदि तुम्हे अच्छी लगे तो उसके अनुसार करो। वही मेरा सेवक है और वही प्रियतम है, जो मेरी आज्ञा माने। हे भाई! यदि मैं कुछ अनीति की बात कहूं तो भय भुलाकर बेखटके मुझे रोक देना।

 

 

 

 

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