हुमायूंमामा Pdf Download | Humayunama Pdf Hindi

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मुग़ल बादशाह बाबर के चार लड़कों में सबसे बड़े लड़के का नाम हुमायु था ,उस का पूरा नाम -नसीरुद्दीन हुंमायूं  -था। जिसे सभी लोग हुंमायूं के नाम से ज्यादा जानते हैं। बाबर अपने बड़े लड़के हुंमायूं को अपने पश्चात् अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था। मुग़ल साम्राज्य की नीव में हुंमायूं का महत्वपूर्ण योगदान था।

 

 

 

हुमायूँ का जमन १५०८ में हुआ था। उसने २३ साल की उम्र में २९ दिसंबर १५३० को बादशाहत आगरा में संभाली थी। हुंमायूं का एक सौतेला भाई था ,उसका नाम कामरान मिर्जा था। हुंमायूं ने उसे काबुल और लाहौर का शासक नियुक्त कर दिया था।

 

 

 

१५३३ में हुंमायूं ने दीनपनाह नामक एक शहर बसाया था। हुंमायूं का शासन उत्तर भारत से ले करअफगानिस्तान और पकिस्तान तक फैला हुआ था। लेकिन उसके सौतेले भाई से उसे हमेंसा ही टक्कर मिलती रही।

 

 

 

हुंमायूं ने अपने जीवन काल में चार बड़े युद्ध का सामना किया था। जी नीचे दिए गए हैं।

 

 

१-देवारा का युद्ध जो- १५३१ में हुआ था।

२- चौसा का युद्ध जो -१५३९ में लड़ा गया था।

३-विलग्राम का युद्ध जिसे -१५४० में लड़ा गया था।

४- सरहिंद का युद्ध भी जिसको -१५४० में ही लड़ा गया था।

 

 

 

चूसा का युद्ध ,शेरशाह सूरी जो बिहार क्षेत्र का शाशक था उसके और हुमायूँ के मध्य चौसा नामक स्थान पर हुआ था। यह युद्ध इतिहास में अपना बहुत महत्व पूर्ण स्थान रखता है। इस युद्ध में अपनी गलत नीति के कारण ही ,शेरशाह सूरी को हुमायूँ से हार झेलने पर विवश होना पड़ा था।

 

 

 

अपनी हार से भय के कारण ही एक भिश्ती का सहारा लेकर गंगा नदी को पार करने के बाद ही हुमायूँ के प्राण बच सके थे। इस युद्ध का इतिहास २६ जून १५३९ ई. मिलता है।

 

 

 

१५४० में फिर एक बार हुमायूँ और शेरशाह सूरी के बीच में युद्ध लड़ा गया था जिसे इतिहास में विलग्राम युद्ध के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध में भी हुमायूँ को हार का मुँह देखना पड़ा था। शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया था।

 

 

 

विलग्राम के युद्ध में मिली हार के कारण हुमायूँ निराश होगया था। उसे सिंध में जाकर निर्वासित जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ा था। अपने निर्वासित जीवन काल में ही उसने -हिन्दाल -के आध्यात्मिक मौलाना फारसवासी शिया मुस्लिम बाबा मीर दोस्त उर्फ़ मीरअली अकबर जामी की लड़की हमीदा बानू से २९ अगस्त १५४१ को निकाह किया था।

 

 

 

हुमायूँ के बेटे का नाम जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर था। हुमायूँ की जीवनी का नाम हुमायूँ नामा है जिसे हुमायूँ की बहन गुलबदन ने लिखा है। गुलबदन ने हुमायूँ नामा में लिखा है कि -हुमायूँ की मौत दीनपनाह भवन में सीढ़ीओं से गिरने के कारण १ जनवरी १९५६ को हो गई।

 

 

 

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गुलबदन बेगम ने यह इतिहास लिखकर सबसे अधिक आवश्यक कार्य पूरा किया है कि अपने वंश और कई दूसरे सामयिक घरो के संबंधो का परिचय करा दिया है। अंग्रेजी अनुवादिका को इन संबंधो के नाम देने में बड़ी कठिनाई पड़ी है क्योंकि यूरोप मे एक शब्द जितने संबंधो के लिए काम में लाया जाता है प्रायः उतने के लिए एशिया में लगभग आधे दर्जन पृथक पृथक शब्द व्यवहार में लाये जाते है।

 

 

 

 

 

 

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