Ishavasya Upanishad Pdf / ईशावास्य उपनिषद Pdf

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

उनकी प्रेम विह्वलता दशा देखकर उनकी भांति ही श्री रघुनाथ जी के नयन से प्रेम का जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया। तदनन्तर प्रभु ने हाथ पकड़कर श्रेष्ठ मुनियो को बैठाया और परम मनोहर वचन कहे। हे मुनीश्वरो! सुनिए, आज मैं धन्य हो गया हूँ। आपके दर्शन से ही सारे पाप नष्ट हो जाते है। बड़े भाग्य से ही सत्संग की प्राप्ति होती है जिससे बिना परिश्रम के ही जन्म-मृत्यु का चक्र नष्ट हो जाता है।

 

 

 

 

संत का संग मोक्ष का और कामी का संग जन्म मृत्यु के बंधन में पड़ने का मार्ग है। संत, कवि और पंडित तथा वेद, पुराण आदि सभी सदग्रंथ ऐसा कहते है।

 

 

 

 

प्रभु के वचन सुनकर चारो मुनि हर्षित होकर पुलकित शरीर से स्तुति करने लगे। हे भगवान! आपकी जय हो। आप अन्तरहित, विकार रहित, पाप रहित, अनेक, सब रूपों में प्रकट, एक अद्वितीय और करुणामय है। हे निर्गुण आपकी जय हो! हे गुण के सागर! आपकी जय हो, जय हो।

 

 

 

 

आप सुख के धाम, अत्यंत सुंदर और अति चतुर है। हे लक्ष्मीपति! आपकी जय हो। हे पृथ्वी को धारण करने वाले! आपकी जय हो। आप उपमा रहित, अजन्मा, अनादि और शोभा की राशि है। आप ज्ञान के भंडार स्वयं मान रहित और दूसरों को मान देने वाले है।

 

 

 

 

वेद और पुराण आपका पावन सुंदर यश गाते है। आप तत्व को जानने वाले, की हुई सेवा को मानने वाले और अज्ञान का नाश करने वाले है। हे निरंजन! मायारहित! आपके अनेको और अनंत नाम है और कोई नाम नहीं है। आप सब नामो से परे है। आप सर्वरूप है, सबमे व्याप्त है और सबके हृदय रूपी घर में सदा निवास करते है।

 

 

 

 

अतः आप हमारा परिपालन करिये। राग, द्वेष, अनुकूलता-प्रतिकूलता, जन्म-मृत्यु आदि द्वन्द विपत्ति और जन्म मृत्यु के जाल का अंत कर दीजिए। हे राम जी! आप हमारे हृदय में बसकर काम और मद को नाश कर दीजिए।

 

 

 

 

आप परमानंद स्वरुप कृपा के धाम और मन की कामनाओ को परिपूर्ण करने वाले है। हे श्री राम जी! हमको अपनी अविचल प्रेमा भक्ति दीजिए।

 

 

 

 

हे रघुनाथ जी! आप हमे अपनी अत्यंत पवित्र करने वाली और तीनो प्रकार के ताप और जन्म-मरण के क्लेशो का नाश करने वाली भक्ति दीजिए। हे शरणागतों की कामना को पूर्ण करने के लिए कामधेनु और कल्पवृक्ष रूप प्रभो! प्रसन्न होकर हमे यही वर दीजिए।

 

 

 

 

हे रघुनाथ जी! आप जन्म-मृत्यु रूप समुद्र को सोखने के लिए अगत्स्य मुनि के समान है। आप सेवा कलरने में सुलभ है तथा सब सुखो को देने वाले है। हे दीन बंधो! मन से उत्पन्न दारुण दुखो का नाश कीजिए और हममे सम दृष्टि का विस्तार कीजिए। आप विषयो की आशा, भय और ईर्ष्या आदि का निवारण करने वाले है तथा विनय विवेक और वैराग्य का विस्तार करने वाले है।

 

 

 

 

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