Jyotish Kaumudi Pdf / ज्योतिष कौमुदी Pdf Download

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Jyotish Kaumudi Pdf / ज्योतिष कौमुदी पीडीएफ

 

 

 

पुस्तक का नाम  ज्योतिष कौमुदी
पुस्तक के लेखक  दुर्गाप्रसाद शुक्ला 
भाषा  हिंदी 
श्रेणी  ज्योतिष 
साइज  4 Mb
फॉर्मेट  Pdf
पृष्ठ  244

 

 

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

 

 

कायरो को भय उपजाने वाली अत्यंत अपवित्र नदी बह चली। दोनों दल उसके दो किनारे है। रथ रेत है और पहिए भंवर है। वह नदी बहुत भयावनी बह रही है। हाथी, पैदल, घोड़े, गदहे और अनेको सवारियां ही जिनकी गिनती कौन करे, नदी के जल जंतु है।

 

 

 

 

87- दोहा का अर्थ-

 

 

 

वीर पृथ्वी पर इस तरह गिर रहे है मानो नदी किनारे वृक्ष ढह रहे हो।  कायर जहां इसे देखकर डरते है वही उत्तम योद्धाओ के मन में सुख होता है।

 

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

एक कहते है – अरे मूर्खो! ऐसी सस्ती, बहुलता है, फिर भी तुम्हारी दरिद्रता नहीं जाती? घायल वीर तट पर पड़े कराह रहे है। मानो जहां-तहां अर्धजल पड़े हो।

 

 

 

 

गीध वीरो के अंग खीच रहे है। मानो मछली मार नदी तट से चित्त लगाए वंशी खेल रहे हो। बहुत से योद्धा बहे जा रहे है और पक्षी उनपर चढ़कर चले जा रहे है। मानो वह नदी में नौका क्रीड़ा खेल रहे हो।

 

 

 

 

योगिनियां खप्परों को भर रही है। भूत पिशाचो की स्त्रियां आकाश में नाच रही है। चामुंडा योद्धाओ के अंगो का करतल बजाते हुए नाना प्रकार से गायन कर रही है। गीदड़ो के समूह शब्द करते हुए मृत वीरो के शरीर को खाते हुए बोल रहे है और पेट भर जाने पर दूसरे को डांटते है।

 

 

 

 

छंद का अर्थ-

 

 

उत्तम योद्धा दूसरे योद्धाओ को ढहा रहे है। श्री राम जी के बल से दर्पित हुए वानर राक्षसों के झुण्ड को  डालते है। श्री राम जी के समूह से योद्धा रणभूमि में सो रहे है।

 

 

 

 

88- दोहा का अर्थ-

 

 

 

रावण ने हृदय में विचार किया कि राक्षसों का नाश हो गया है मैं अकेला हूँ और वानर भालू बहुत है। इसलिए अब मैं अपार माया रचूं।

 

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

देवताओ ने प्रभु को पैदल देखा तो उनके हृदय में बड़ा भारी क्षोभ हुआ। इंद्र ने तुरंत ही अपना रथ भेज दिया। उनका सारथी मातलि हर्ष के साथ उसे ले आया।

 

 

 

उस दिव्य अनुपम और तेजोमय रथ पर कोशलपुरी के राजा श्री राम जी हर्षित होकर चढ़ गए। उसमे चार चंचल, मनोहर, अजर, अमर और मन की गति के समान चलने वाले घोड़े जुते हुए थे।

 

 

 

श्री रघुनाथ जी को रथारूढ़ देखकर वानर विशेष बल प्राप्त करके दौड़े। वानरों के द्वारा दिया जाने वाला घाव रावण नहीं सह पाया। तब उसने माया फैलाई।

 

 

 

 

एक रघुवीर जी को ही वह माया नहीं लगी। सब वानरों और लक्ष्मण जी ने भी उस माया को सच मान लिया। वानरों ने राक्षसी सेना लक्ष्मण जी के साथ बहुत से राम को देखा।

 

 

 

 

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