कान्यकुब्ज ब्राह्मण वंशावली | Kanyakubj Brahmin Vanshavali Pdf

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एक जंगल के बीच में एक बहुत पुराना किला था। समय के साथ वह खंडहर बन गया था। उसमे एक कमरा सुरक्षित था बाकी अवशेष रूप में थे। उसमे एक भूरा सियार अपने परिवार के साथ रहता था। गोपी नामक एक लकड़हारा था। वह जंगल से सूखी लकड़ी तोड़ता उन्हें बाजार में बेचने जाता फिर उससे प्राप्त हुए पैसो से अपनी जीविका चलाता था।

 

 

 

मन किसी का बूढ़ा नहीं होता है। गोपी का मन भी बूढ़ा नहीं था। वह सोचता था कि अगर हमे एक छोटा सा घर मिल जाए तथा उसमे जीवनोपयोगी सभी वस्तुओ की उपलब्धता हो तो फिर हमारी जिंदगी भी मजे से कट जाएगी। महादेव और पार्वती जा रहे थे।

 

 

 

उन्होंने गोपी को खुद से बाते करते हुए सुना तो पार्वती जी मुस्कुराते हुए बोली – देवाधिदेव महादेव जी! आप गोपी की इच्छा पूरी कर दो देखे यह फिर क्या करता है? महादेव बोले – भवानी! आप भी यह क्या बात लेकर बैठ गयी चलो गोपी की इच्छा पूरी कर देता हूँ।

 

 

 

महादेव की कृपा से खंडहर हो गए किले में जो कमरा सुरक्षित था उसमे जीवनोपयोगी सभी वस्तुए एकत्र हो गयी। गोपी घूमते हुए उस खंडहर हो चुके किले में गया तो दैवयोग से उसे वह स्थान खूब पसंद आया थोड़ा इधर उधर देखने पर उसे एक सुरक्षित कमरा दिखा जहां सभी उपयोग की वस्तुए ढंग से रखी हुई थी।

 

 

 

अब गोपी वही रहने लगा। रात होने पर भूरा सियार अपने परिवार के साथ उस खंडहर किले से बाहर निकला तो उसे किसी मनुष्य की आहट सुनाई पड़ी। गोपी कह रहा था आज से मैं यहां का राजा हूँ। हमारे अलावा यहां कोई नहीं रहेगा। इतना सुनते ही भूरा सियार अपने परिवार के साथ भागने लगा।

 

 

 

बाहर निकलते ही उसे एक लोमड़ी मिली उसने कहा – भूरा! कहां परिवार के साथ भाग रहे हो? भूरा बोला – तुम्हे नहीं मालूम है क्या? मैं जहां पर रहता हूँ वहां पर न जाने कौन जीव है जो खुद को राजा बता रहा और कह रहा है यहां किसी को रहने नहीं देगा। लोमड़ी बोली – चलो मैं देखती हूँ कि वह कौन है?

 

 

 

गोपी बाहर देख रहा था। भूरा सियार के साथ एक लोमड़ी भी आ रही है। वह डरता हुआ एक बड़े से ड्रम में (जिसमे अनाज रखा जाता है) उसमे छुप गया। उस अनाज रखने वाले ड्रम में एक गोल और बड़ा सा छेद था जिसमे से अनाज निकाला जाता है। लोमड़ी बोली – कहां है वह जीव जो यहां का राजा खुद को कहता है?

 

 

 

लोमड़ी ने पूरा कमरा छान डाला लेकिन उसे कही ‘राजा’ नहीं मिला। तब भूरा सियार बोला – शायद उस ड्रम में बैठा होगा। लोमड़ी बोली – मैं उस ड्रम के छेद में पूंछ डालकर देखती हूँ। लोमड़ी ने जैसे ही ड्रम के छेद में अपनी पूंछ डाला ड्रम के अंदर बैठे गोपी ने लोमड़ी की पूँछ को पकड़ लिया।

 

 

 

अब तो लोमड़ी की हालत देखने लायक थी। वह अपनी पूंछ छुड़ाने के लिए उछल कूद मचाने लगी। गोपी ड्रम के अंदर से बोला – अब मैं तुझे नहीं छोडूंगा। काफी प्रयास के बाद लोमड़ी छूट तो गयी पर उसकी पूंछ उखड़ गयी थी। भूरा पहले ही डरकर भाग गया था। लोमड़ी चिल्लाते हुए भागी भूरा के घर में पूंछ उखाड़ आया है।

 

 

 

लोमड़ी और भूरा को भागते देख जंगल का राजा शेर ने पूछा – तुम लोग क्यों भाग रहे हो? लोमड़ी ने अपनी उखड़ी हुई पूंछ की जगह दिखाते हुए कहा – भूरा के घर में पूंछ उखाड़ आया है उसने भूरा के घर पर कब्जा कर लिया है तथा हमारी पूंछ भी उखाड़ दिया।

 

 

 

वनराज शेर ने कहा – चलो मैं देखता हूँ वह कौन है जो खुद को राजा कह रहा है तथा तुम्हारी पूंछ भी उखाड़ डाला? भूरा डरते हुए बोला – मैं नहीं जाऊंगा। वनराज शेर ने कहा – चलो तुम हमारी पूंछ से अपनी पूंछ को बाँध लो हम दोनों उसके ऊपर एक साथ ही धावा बोल देंगे।

 

 

 

भूरा सियार और वनराज शेर ने एक दूसरे के पूंछ में अपनी पूंछ को बांध लिया। गोपी ने देखा इस बार भूरा के साथ शेर भी आ रहा है। भूरा और शेर जैसे ही कमरे के पास पहुंचे तब गोपी ने ड्रम को जोर-जोर से बजाना शुरू कर दिया। वनराज ड्रम की आवाज सुनकर घबड़ा गया और बोला – यह तो हमसे ज्यादा तेज दहाड़ रहा है।

 

 

 

गोपी ड्रम की आवाज के साथ ही कहता जा रहा था अब मैं इन दोनों को नहीं छोडूंगा। गोपी की आवाज सुनकर वनराज शेर डरकर भागने पर मजबूर हो गया। पूंछ बंधी होने के कारण बेचारा भूरा शेर के साथ घिसटते हुए घायल हो गया फिर वह कभी उस किले के पास आने का साहस नहीं कर सका। गोपी की इच्छा पूरी हो गयी महादेव और पार्वती भी गोपी की चालाकी पर खुश थे।

 

 

 

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