Mahabharat Pdf Hindi / संपूर्ण महाभारत Pdf Download

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Mahabharat Pdf / महाभारत पीडीऍफ़ डाउनलोड 

 

 

पुस्तक का नाम  संपूर्ण महाभारत
पुस्तक के लेखक  महर्षि वेदव्यास 
पुस्तक की भाषा  हिंदी 
श्रेणी  धार्मिक 
फॉर्मेट  Pdf
साइज  162.2 Mb
कुल पृष्ठ  5424

 

 

 

Mahabharat Pdf Hindi
संपूर्ण महाभारत Pdf Free Download

 

 

 

दुर्गा सप्तशती Pdf Download

 

 

 

 

 

 

महाभारत की 7 छोटी-बड़ी कहानियां

 

 

 

1- महाभारत की लड़ाई में जब भीष्म को अर्जुन ने शर-शैय्या पर सुला दिया था तब दुर्योधन ने गुरु द्रोण को अपना सेनापति बनाया था। उन्होंने सेनापति के रूप में बहुत ही घोर संग्राम किया। संध्याकाल में संग्राम के उपरांत पांडव सोचने लगे कि द्रोणाचार्य तो हम लोगो को विजय श्री से वंचित कर देंगे।

 

 

 

 

तभी योगेश्वर ने यह युक्ति सुझाई कि द्रोण को अगर कोई दुखद समाचार प्राप्त हो जाय तो वह विरक्त होकर संग्राम नहीं करेंगे तत्पश्चात ही उनका अंत किया जा सकता है। पांडवो की सेना में अश्वस्त्थामा नामक हाथी। योगेश्वर कृष्ण की आज्ञा से महाबली भीम ने उसका अंत कर दिया।

 

 

 

 

गुरु द्रोण के पुत्र का नाम भी अश्वस्त्थामा था और उसके अंत की खबर द्रोणाचार्य तक पहुंचाना था। इस कार्य के लिए पांडवो के ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर को तैयार किया गया क्योंकि युधिष्ठिर कभी असत्य नहीं कहते थे। युधिष्ठिर ने गुरु द्रोण के पास जाकर कहा – अश्वस्त्थामा मरो, नरोवा कुंजरो! तभी श्री कृष्ण ने जोर की शंख ध्वनि किया।

 

 

 

 

गुरु द्रोण ने ‘कुंजरो’ शब्द नहीं सुना चूँकि युधिष्ठिर कभी असत्य नहीं कहते थे। इसलिए द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर द्वारा कहे गए वाक्य पर भरोसा करके संग्राम से विरक्त होकर बैठ गए उसी समय द्रुपद के पुत्र धृष्टद्युम्न ने जो पांडवो का सेनापति था द्रोणाचार्य का अंत कर दिया।

 

 

 

2- गीता सार की कहानी

 

 

 

महाभारत की सबसे मुख्य कहानी गीता सार है। जिसे योगेश्वर कृष्ण ने अर्जुन को सुनाया था। जिससे प्रेरित होकर अर्जुन संग्राम भूमि में उतर सका।

 

 

 

गीता से यह सीख लेना चाहिए कि भगवान के ऊपर सब कुछ आश्रित किए बिना अपने कर्म के ऊपर ध्यान देकर उसके फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए।

 

 

 

3- दानवीर कर्ण

 

 

 

 

संग्राम भूमि में जब कर्ण का अंत समय था तब श्री कृष्ण उसके पास दान वीरता की परीक्षा लेने के लिए गए और उससे स्वर्ण की मांग किया। कर्ण के दांत में स्वर्ण लगा हुआ था उसने अपना दांत तोड़कर ब्राह्मण वेषधारी श्री कृष्ण को देना चाहा तब उन्होंने कहा यह जूठा है मैं इसे नहीं ग्रहण करुंगा।

 

 

 

उसी समय कर्ण ने अपने संकल्प से पृथ्वी के भीतर से जलधार प्रकट करके अपने स्वर्ण जड़ित दांत को धोकर ब्राह्मण वेश में श्री कृष्ण को अर्पण कर दिया।

 

 

 

4- द्रोपदी चीर हरण

 

 

 

 

जब पांडव कौरव के साथ पासा के खेल में अपना सब कुछ शकुनि की चालाकी के कारण हारकर द्रोपदी को भी दांव पर लगा दिए तथा द्रोपदी को भी हार गए।

 

 

 

 

उसी समय दुर्योधन का छोटा भाई दुःशासन अपने अपमान का बदला लेने के लिए भरी सभा में द्रोपदी का चीर हरण करने लगा। द्रोपदी की पुकार पर योगेश्वर श्री कृष्ण ने उसकी लाज बचाई थी।

 

 

 

5- कर्ण के जन्म की कहानी

 

 

 

 

महाभारत का एक महत्वपूर्ण पात्र कर्ण भी है। कुंती के विवाह के पहले ही कर्ण का जन्म हुआ था। कर्ण का जन्म सूर्यदेव के आशीर्वाद के फलस्वरूप ही था।

 

 

 

 

लोक निंदा के कारण कुंती ने उसे एक पात्र में रखकर नदी के जल में प्रवाहित कर दिया था। वह पात्र राधा और अधिरथ नामक दम्पति को प्राप्त हुआ। उन्होंने ही उसका पालन पोषण किया था। इसलिए ही कर्ण को महाभारत में सूत पुत्र कहा।

 

 

 

 

 6- हिडिम्बा और भीम

 

 

 

 

भीम और हिडिम्बा का पुत्र घटोत्कक्ष था जो बहुत वीर था तथा महाभारत के संग्राम में उसकी भी एक भूमिका थी।

 

 

 

7- द्रोपदी विवाह

 

 

 

 

राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री द्रोपदी के विवाह के लिए स्वयंवर रचा था। उस समय पांडवो का अज्ञात वास चल रहा था। उस स्वयंवर में एक चक्र द्वारा रक्षित मत्स्य की आँख को भेदना था जो किसी भी राजा से न हो सका।

 

 

 

 

तब ब्राह्मण के रूप में अज्ञातवास में रहते हुए अर्जुन ने उस मत्स्य की आँख को भेदकर द्रोपदी को जीत लिया। सभी पांडव उसके बाद अपनी माता कुंती के पास गए। कुंई ने फल समझकर उन्हें आपस में बांटने के लिए कह दिया तभी से द्रोपदी को पांडवो की पत्नी माना जाने लगा।

 

 

 

 

8- एकलव्य की गुरु दक्षिणा

 

 

 

 

एकलव्य एक भील पुत्र था। उसकी इच्छा बहुत बड़ा धनुर्धर बनने की थी। वह गुरु द्रोण के पास गया लेकिन वहां उसे निराश होना पड़ा कारण कि राजगुरु होने के कारण वह अन्य किसी को वह अपनी विद्या नहीं सिखाते थे। एकलव्य उदास होकर लौट आया और गुरु द्रोण की एक मिट्टी की मूर्ति का निर्माण करके वह अपना अभ्यास प्रारंभ कर दिया फलस्वरूप वह बहुत बड़ा धनुर्धर हो गया।

 

 

 

 

यह बात गुरु द्रोण को मालूम हुई तो वह उससे गुरु दक्षिणा मांगने आ गए एकलव्य चाहता तब गुरु द्रोण को दक्षिणा के लिए मना कर सकता था लेकिन उसने गुरु भक्ति का अनोखा उदाहरण देते हुए गुरु द्रोणाचार्य को अपने दाहिने हाथ का अंगूठा दान में दे दिया।

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

मैंने तो दिग्पालों से भी जल भरवाया है और तू एक राजा का सुयश मुझे सुनाता है। यदि तेरा मालिक जिसकी गुणगाथा तू बार-बार कह रहा है संग्राम में लड़ने वाला योद्धा है।

 

 

 

 

तो वह दूत किसलिए भेजता है? शत्रु से संधि करते हुए लाज नहीं आती है? पहले कैलाश को मथने वाली मेरी भुजाओ को देख। फिर अरे वानर! अपने मालिक की सराहना करना।

 

 

 

 

28- दोहा का अर्थ-

 

 

 

रावण के समान शूरवीर कौन है? जिसने अपने हाथो से ही शिर अत्यंत हर्ष के साथ बहुत बार उन्हें होम कर दिया। स्वयं गौरीपति शिव जी इस बात के साक्षी है।

 

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

मस्तको के तप्त होते समय मैंने अपने ललाट पर लिखे हुए विधाता के अक्षर देखे तब मनुष्य के हाथ से मृत्यु होना बांचकर विधाता के लेख को असत्य जानकर मैं हंसा।

 

 

 

 

उस बात का स्मरण करके भी मेरे मन में डर नहीं है। मैं समझता हूँ कि बूढ़े ब्रह्मा ने बुद्धि के भ्रम से ही ऐसा लिख दिया है। अरे मुर्ख! तू लज्जा और मर्यादा छोड़कर मेरे सामने दूसरे वीर का बार-बार बखान करता है।

 

 

 

 

अंगद ने कहा – अरे रावण! तेरे समान लज्जावान जगत में कोई नही है। लज्जाशीलता तो तेरा सहज स्वभाव है। तू अपने मुंह से अपना गुण कभी नहीं कहता।

 

 

 

 

शिर और कैलाश उठाने की कथा चित्त में चढ़ी हुई थी जिसे तूने बीसो बार कह डाला। भुजाओ के उस बल को तूने अपने हृदय में छिपा रखा है। जिससे तूने सहस्रबाहु, बलि और बाली को जीता था।

 

 

 

हे रावण! मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान छोड़कर मेरी सीख सुनो। तुम अपने पवित्र कुल का विचार करके देखो और भ्रम को छोड़कर भगत भयहारी भगवान को भजो।

 

 

 

 

जो देवता, राक्षस और समस्त चराचर को खा जाता है। वह काल भी जिनके काल से अत्यंत डरता है उनसे कदापि बैर न करो और मेरे कहने से जानकी जी को दे दो।

 

 

 

 

22- दोहा का अर्थ-

 

 

 

खर के शत्रु श्री रघुनाथ जी शरणागत के रक्षक और दया के समुद्र है। शरण में जाने पर प्रभु तुम्हारा अपराध भुलाकर अपनी शरण में रख लेंगे।

 

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

तुम श्री राम जी के चरण कमल को अपने हृदय में धारण करो और लंका में अचल राज करो। ऋषि पुलत्स्य जी का यश चन्द्रमा के समान निर्मल है। उस चन्द्रमा में तुम कलंक न बनो।

 

 

 

 

राम नाम के बिना वाणी शोभा नहीं पाती है। मद, मोह को छोड़कर विचारकर देखो। हे देवताओ के शत्रु! राम से विमुख रहने वाले पुरुष की प्रभुता और संपत्ति रहते हुए भी चली जाती है और उसका मिलना न मिलने के ही बराबर है।

 

 

 

 

जिन नदियों में जल का मूल स्रोत नहीं है तथा जिन्हे केवल बरसात का ही आसरा रहता है। वह वर्षा बीतने पर तुरंत ही सूख जाती है।

 

 

 

 

हे रावण! सुनो, मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि राम से विमुख होने वाले की रक्षा करने वाला कोई भी नहीं है। हजारो शंकर, ब्रह्मा और विष्णु भी श्री राम जी के साथ द्रोह करने पर तुम्हे नहीं बचा सकते है।

 

 

 

उन तपस्वियों से तेरी भेट हुई या वह हमारा सुयश सुनकर लौट गए? शत्रु सेना का तेज और बल क्यों नहीं बताता है? तेरा चित्त बहुत ही चकित हो रहा है।

 

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

 

दूत ने कहा – हे नाथ! आपने जैसे कृपा करके पूछा है। वैसे ही क्रोध छोड़कर मेरा कहना मानिए और मेरी बात पर विश्वास कीजिए। जब आपका छोटा भाई श्री राम जी से जाकर मिला तब उसके पहुंचते ही श्री राम जी ने उसका राजतिलक कर दिया

 

 

 

 

हम रावण के दूत है। यह सुनकर वानरों ने हमे बांधकर बहुत कष्ट दिए यहां तक कि वह हमारे नाक, कान भंग करने लगे। श्री राम जी की शपथ देने पर तब कही उन्होंने हमे छोड़ा।

 

 

 

 

हे नाथ! आपने श्री राम जी की सेना पूछी सो वह तो कोटि मुख से भी वर्णन की जा सकती है। अनेक रंग भालू और वानरों की सेना है। जो भयंकर मुख वाले विशाल शरीर वाले और भयानक है।

 

 

 

 

जिसने नगर का दहन किया और आपके पुत्र अक्षय कुमार को परलोक भेजा उसका बल तो सब वानरों से कम है। असंख्य नाम वाले बड़े ही कठोर और भयानक योद्धा है। उनमे असंख्य हाथियों का बल है और वह बहुत ही विशाल है।

 

 

 

 

54- दोहा का अर्थ-

 

 

 

द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख, केशरी, निसठ, सठ और जांबवंत यह सभी बल की राशि है।

 

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

यह सब वानर सुग्रीव के समान है और इनके जैसे एक दो नहीं कई कोटि है। उन बहुत संख्या को गिन ही कौन सकता है? श्री राम जी की कृपा से उनमे अतुलनीय है। वह तीनो लोको को तृण के समान तुच्छ समझते है।

 

 

 

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