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Mayavi Shabar Mantra Pdf Download

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सिर्फ पढ़ने के लिये
इस विल्व की जड़ के परम उत्तम जल से भरा हुआ देखकर महादेव जी पूर्णतया संतुष्ट होते है। जो मनुष्य पुष्प, गंध आदि से विल्व के मूल भाग का पूजन करता है वह शिव लोक को पाता है और इस लोक में भी उसकी सुख संतति बढ़ती है। जो विल्व की जड़ के निकट आदरपूर्वक दीपावली जलाकर रखता है।
वह तत्वज्ञान से सम्पन्न हो भगवान महेश्वर में मिल जाता है। जो विल्व की शाखा थामकर हाथ से उसके नए-नए पल्लव उतारता और उनसे उस विल्व की पूजा करता है वह सब पापो से मुक्त हो जाता है। जो विल्व के जड़ के नजदीक भगवान शंकर में अनुराग रखने वाले एक भक्त को भी भक्ति पूर्वक भोजन कराता है उसे कोटिगुना पुण्य प्राप्त होता है।
जो विल्व की जड़ के पास शिव भक्त को खीर और घृत से युक्त अन्न देता है वह कभी दरिद्र नहीं होता। ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने सांगोपांग शिव लिंग पूजन का वर्णन किया। यह प्रवृत्तिमार्गी तथा निवृत्तिमार्गी पूजको के भेद से दो प्रकार का होता है।
प्रवृत्तिमार्गी लोगो के लिए पीठ पूजा इस धरती पर सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओ को देने वाली होती है। प्रवृत्ति पुरुष सुपात्र गुरु आदि के द्वारा ही सारी पूजा सम्पन्न करे और अभिषेक के अंत में अगहनी के चावल से बना हुआ नैवेद्य निवेदन करे। पूजा के अंत में शिव लिंग को शुद्ध सम्पुट में विराजमान करके घर के अंदर कही अलग रख दे।
निवृत्तिमार्गी उपासको के लिए हाथ पर ही शिव पूजन का विधान है। उन्हें भिक्षा आदि से प्राप्त हुए अपने भोजन को ही नैवेद्य रूप में निवेदित कर देना चाहिए। निवृत्त पुरुषो के लिए सूक्ष्म लिंग ही श्रेष्ठ बताया जाता है। वे विभूति से पूजन करे और विभूति को ही नैवेद्य रूप से निवेदित भी करे। पूजा करके उस लिंग को हमेशा अपने मस्तक पर धारण करे।
ऋषि बोले – महाभाग व्यासशिष्य सूत जी! आपको नमस्कार है। अब आप उस परम उत्तम भस्म माहात्म्य का ही वर्णन कीजिए। भस्म माहात्म्य, रुद्राक्ष माहात्म्य तथा उत्तम नाम माहात्म्य इन तीनो को परम प्रसन्नतापूर्वक प्रतिपादन कीजिए और हमारे हृदय को आनंद दीजिए।
सूत जी ने कहा – महर्षियो! आपने बहुत उत्तम बात पूछी है। वह समस्त लोको के लिए हितकारी विषय है। जो लोग भगवान शंकर की उपासना करते है वे धन्य है, कृतार्थ है उनका देह धारण सफल है। तथा उनके समस्त कुल का उद्धार हो गया।
जिनके मुख में भगवान शिव का नाम है जो अपने मुख से सदाशिव और इत्यादि नामो का उच्चारण करते रहते है जैसे खदिर वृक्ष के अंगार को छूने का साहस कोई भी प्राणी नहीं कर सकते। हे श्रीशिव! आपको नमस्कार है। ऐसी बात जब मुँह से निकलती है तब वह समस्त पापो का विनाश करने वाला पावन तीर्थ बन जाता है।
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