Meghdutam Pdf in Hindi / मेघदूत कालिदास Pdf

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Meghdutam Pdf in Hindi Download

 

 

पुस्तक का नाम  Meghdutam Pdf in Hindi
पुस्तक के लेखक  महाकवि कालिदास 
फॉर्मेट  Pdf 
भाषा  हिंदी 
साइज  5.1 Mb 
पृष्ठ  406 
श्रेणी  साहित्य 

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

यदि श्रोता गृहस्थ हो तो उस बुद्धिमान को उस श्रवण कर्म की शांति के लिए शुद्ध हविष्य के द्वारा होम करना चाहिए। मुने! रुद्रसंहिता के प्रत्येक श्लोक द्वारा होम करना उचित है अथवा गायत्री मंत्र से होम करना चाहिए क्योंकि वास्तव में यह पुराण गायत्री मंत्र ही है।

 

 

 

 

अथवा शिवपंचाक्षर मूल मंत्र से हवन करना उचित है। होम करने की शक्ति न हो तो विद्वान पुरुष यथा शक्ति हवनीय हविष्य का ब्राह्मण को दान करे। न्यूनातिरिक्त रूप दोष की शांति के लिए भक्ति पूर्वक शिव सहस्र नाम का पाठ करे। इससे सब कुछ सफल होता है।

 

 

 

 

इसमें संशय नहीं है क्योंकि तीनो लोको में उससे बढ़कर कोई वस्तु नहीं है। कथा श्रवण संबंधी व्रत की पूर्णता की सिद्धि के लिए ग्यारह ब्राह्मणो को मधु मिश्रित खीर भोजन कराये और उन्हें दक्षिणा दे। मुने! यदि शक्ति हो तो तीनो तोले सोने का एक सुंदर सिंहासन बनवाये और उसपर उत्तम अक्षरों में लिखी हुई शिव पुराण की पोथी विधि पूर्वक स्थापित करे।

 

 

 

 

तत्पश्चात पुरुष उसकी आवाहन आदि विविध उपचारो से पूजा करके दक्षिणा चढ़ाये। फिर जितेन्द्रिय आचार्य का वस्त्र, गंध और आभूषण आदि से पूजन करके दक्षिणा सहित वह पुस्तक उन्हें समर्पित कर दे। उत्तम बुद्धि वाला श्रोता इस प्रकार भगवान शिव के संतोष के लिए पुस्तक का दान करे।

 

 

 

 

शौनक! इस पुराण के उस दान के प्रभाव से भगवान शिव का अनुग्रह पाकर भवबंधन से मुक्त हो जाता है। इस तरह विधि विधान का पालन करने पर श्री सम्पन्न शिव पुराण सम्पूर्ण फल को देने वाला तथा भोग और मोक्ष का दाता होता है। मुने! शिव पुराण का वह सारा माहात्म्य जो सम्पूर्ण अभीष्ट को देने वाला है।

 

 

 

 

मैंने तुम्हे कह सुनाया। अब और क्या सुनना चाहते हो? श्रीमान शिव पुराण समस्त पुराणों के भाल का तिलक माना जाता है। यह भगवान शंकर को अत्यंत प्रिय, रमणीय और भवरोग का निवारण करने वाला है जो सदा भगवान शंकर का ध्यान करते है।

 

 

 

 

जिनकी वाणी शिव के गुणों की स्तुति करती है और जिनके दोनों कान उनकी कथा सुनते है इस जीव जगत में उन्ही का जन्म लेना सफल है वे निश्चय ही संसार सागर से पार हो जाते है। अलग-अलग प्रकार के सभी गुण जिनके सच्चिदानंदमय स्वरुप का कभी स्पर्श नहीं करते।

 

 

 

 

जो अपनी महिमा से जगत के भीतर और बाहर भासमान है और जो मन के बाहर और अंदर वाणी और मनोवृत्तिरूप में प्रकाशित होते है उन आनंदघनरूप परम शिव की मैं शरण लेता हूँ। जो आदि और अंत में नित्य मंगलमय है जिनकी समानता और तुलना कही भी नहीं है।

 

 

 

 

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