Mrutyunjay Pdf / मृत्युंजय Pdf

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

फिर श्री राम जी के राज्याभिषेक का प्रसंग, फिर राजा दशरथ जी  वचन से राज्याभिषेक के आनंद में भंग पड़ना, फिर नगर वासियो का विरह, विषाद और श्री राम लक्ष्मण का संवाद कहा। श्री राम का वन गमन, केवट का प्रेम, गंगा जी से पार उतरकर प्रयाग में निवास, वाल्मीकि जी और प्रभु श्री राम जी का मिलन और जैसे भगवान चित्रकूट में बसे वह सब कहा।

 

 

 

 

फिर मंत्री सुमंत्र जी का नगर में लौटना, राजा दशरथ जी का मरण, भरत जी का ननिहाल से अयोध्या आना और उनके प्रेम का बहुत वर्णन किया। राजा की अंतेष्टि क्रिया करके नगरवासियो को साथ लेकर भरत जी वहां गए जहां सुखराशि प्रभु श्री राम जी थे।

 

 

 

 

फिर रघुनाथ जी ने उनको बहुत प्रकार से समझाया, जिससे वह खड़ाऊ लेकर अयोध्यापुरी लौट आये वह सब कथा कही। भरत जी की नंदीग्राम में रहने की रीति, इंद्रपुत्र जयंत की नीच करनी और प्रभु श्री राम जी और अत्रि जी का मिलाप वर्णन किया।

 

 

 

 

जिस प्रकार विराध का अंत हुआ और शरभंग जी ने शरीर का त्याग किया वह सब प्रसंग कहकर फिर सुतीक्ष्ण जी का प्रेम वर्णन करके प्रभु और अगस्त्य जी का सत्संग वृतांत कहा।

 

 

 

 

दंडक वन का पवित्र करना कहकर फिर भुशुण्डि जी ने गीधराज के साथ मित्रता का वर्णन किया। फिर जिस प्रकार प्रभु ने पंचवटी में निवास किया और सभी मुनि के भय का नाश किया और फिर जैसे लक्ष्मण जी को अनुपम उपदेश दिया और शूर्पणखा को कुरूप किया वह सब वर्णन किया।

 

 

 

 

फिर खर-दूषण का अंत और जिस प्रकार रावण ने सब समाचार प्राप्त किया वह सब बखान कर कहा तथा जिस प्रकार रावण और मारीच की बातचीत हुई वह सब उन्होंने कही। फिर माया सीता का हरण और श्री रघुवीर के विरह का कुछ वर्णन किया। फिर प्रभु ने गीध जटायु की जिस प्रकार क्रिया की।

 

 

 

 

कबंध का अंत करके शबरी को परम गति प्रदान किया और फिर जिस प्रकार विरह का वर्णन करते हुए श्री रघुवीर पंपासर के निकट गए वह सब कहा।

 

 

 

 

प्रभु और नारद जी का संवाद और मारुति के मिलने का प्रसंग कहकर फिर सुग्रीव से मित्रता और बालि के प्राण का अंत का वर्णन किया। सुग्रीव का राजतिलक का वर्णन करके प्रभु ने प्रवर्षण पर्वत पर निवास किया। वह तथा वर्षा और शरद का वर्णन श्री राम जी का सुग्रीव पर रोष और सुग्रीव का भय प्रसंग आदि सब कहे।

 

 

 

 

जिस प्रकार वानर राज सुग्रीव ने वानरों को पठाया और वह सीता जी की खोज में सब दिशाओ में गए जिस प्रकार से उन्होंने विवर ‘खोह’ में प्रवेश किया फिर जिस प्रकार से वानरों को सम्पाती मिला वह कथा कही। सम्पाती से सब कथा सुनकर पवनपुत्र हनुमान जी जिस तरह से अपार समुद्र का लाँघ गए।

 

 

 

 

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