Nandi Nadi Jyotish Pdf Hindi / नंदी नाड़ी ज्योतिष Pdf Download

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

नंदिकेश्वर कहते है – तदनन्तर जगदंबा पार्वती के साथ बैठे हुए गुरुवर महादेव जी ने उत्तराभिमुख बैठे हुए ब्रह्मा और विष्णु को पर्दा करने वाले वस्त्र से आच्छादित करके उनके मस्तक पर अपना करकमल रखकर धीरे-धीरे उच्चारण करके उन्हें उत्तम मंत्र का उपदेश किया।

 

 

 

 

मंत्र-तंत्र में बताई हुई विधि के पालन पूर्वक तीन बार मंत्र का उच्चारण करके भगवान शंकर ने उन दोनों शिष्यों को मंत्र की दीक्षा दी। फिर उन शिष्यों ने गुरु दक्षिणा के रूप में अपने आपको ही समर्पित कर दिया और दोनों हाथ जोड़कर उनके समीप खड़े हो उन देवेश्वर जगतगुरु का स्तवन किया।

 

 

 

 

विष्णु और ब्रह्मा बोले – प्रभो! आप निष्कल रूप है आपको नमस्कार है। आप निष्कल तेज से प्रकाशित होते है आपको नमस्कार है। आप सबके स्वामी है। आपको नमस्कार है। आप सर्वात्मा को नमस्कार है अथवा सकल स्वरुप आप महेश्वर को नमस्कार है।

 

 

 

 

आप प्रणव के वाच्यार्थ है आपको नमस्कार है। आप प्रणव लिंग वाले है आपको नमस्कार है। पालन, सृष्टि, संहार, अनुग्रह और तिरोभाव करने वाले आपको नमस्कार है। आपके पांच मुख है। आप परमेश्वर को नमस्कार है। पंचब्रह्म स्वरुप पांच कृत्य वाले आपको नमस्कार है।

 

 

 

 

आप सबके आत्मा है ब्रह्म है। आपके गुण और शक्तियां अनंत है आपको नमस्कार है। आपके सकल और निष्कल दो रूप है। आप सद्गुरु एवं शंभु है आपको नमस्कार है। महेश्वर बोले – आर्द्रा नक्षत्र से युक्त चतुर्दशी को प्रणव जप किया जाय तो वह अक्षय फल देने वाला होता है।

 

 

 

 

सूर्य की संक्रांति से युक्त महा आर्द्रा नक्षत्र में एक बार किया हुआ प्रणव जप कोटि गुने जप का फल देता है। मृगशिरा नक्षत्र का अंतिम भाग पुनर्वसु का आदिम भाग पूजा होम और तर्पण आदि के लिए सदा आर्द्रा के समान ही होता है।

 

 

 

 

यह जानना चाहिए मेरा या मेरे लिंग का दर्शन प्रभात काल में ही प्रातः और मध्यान्ह के पूर्व काल में करना चाहिए। मेरे दर्शन पूजन के लिए चतुर्दशी तिथि निशीथव्यापिनी अथवा प्रदोषव्यापिनी लेनी चाहिए क्योंकि परिवर्तिनी तिथि से संयुक्त चतुर्दशी की ही प्रसंशा की जाती है।

 

 

 

 

पूजा करने वालो के लिए मेरी मूर्ति और लिंग दोनों समान है फिर भी मूर्ति की अपेक्षा लिंग का स्थान ऊँचा है। इसलिए मुमुक्ष पुरुषो को चाहिए कि वे वेर से भी श्रेष्ठ समझकर लिंग का ही पूजन करे। लिंग का ॐकार मंत्र से और वेर का पंचाक्षर मंत्र से पूजन करना चाहिए।

 

 

 

 

शिव लिंग की स्वयं ही स्थापना करके या दूसरों से भी स्थापना करवाकर उत्तम द्रव्यमय उपचारो से पूजा करनी चाहिए। इससे पद सुलभ हो जाता है। इस प्रकार उन दोनों शिष्यों को उपदेश देकर भगवान शंकर वही अंतर्ध्यान हो गए।

 

 

 

 

ऋषियों ने पूछा – सूत जी! शिव लिंग की स्थापना कैसे करनी चाहिए? उसका लक्षण क्या है? और उसकी पूजा कैसे करनी चाहिए किस देश काल में करनी चाहिए और किस द्रव्य के द्वारा उसका निर्माण होना चाहिये।

 

 

 

 

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