Narayan Kavach Pdf / नारायण कवच Pdf

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Narayan Kavach Pdf Download

 

 

 

पुस्तक का नाम  Narayan Kavach Pdf
पुस्तक के लेखक  Gita Press
भाषा  हिंदी 
फॉर्मेट  Pdf 
साइज  1 Mb 
श्रेणी  धार्मिक 
पृष्ठ  32 

 

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

हजारो जीवन मुक्त में से भी सब सुखो का भंडार, ब्रह्म में लीन विज्ञानवान पुरुष और भी दुर्लभ है। धर्मात्मा, वैराग्यवान, जीवन मुक्त और ब्रह्मलीन इन सब में भी हे देवाधि देव महादेव जी! वह प्राणी अत्यंत दुर्लभ है जो मद और माया से रहित होकर श्री राम जी के भक्ति का परायण होता है। हे विश्वनाथ! ऐसी दुर्लभ हरिभक्ति को कौवा ने कैसे प्राप्त किया मुझे समझाकर कहिए।

 

 

 

 

हे नाथ! कहिए, ऐसे श्री राम परायण, गुण धाम, ज्ञान निरत और धीर बुद्धि भुशुण्डि जी ने कौए का शरीर किस कारण से प्राप्त किया?

 

 

 

 

हे कृपालु! बताइये, उस कौए ने प्रभु का यह पवित्र और सुंदर चरित्र कहां पाया? और हे कामदेव के शत्रु! यह भी बताइये आपने इसे किस प्रकार सुना? मुझे बहुत भारी कौतुहल हो रहा है। गरुण जी महाज्ञानी, सद्गुणों की राशि श्री हरि के सेवक और उनके अत्यंत निकट रहने वाले उनके वाहन ही है।

 

 

 

 

उन्होंने मुनि के समूह को छोड़कर कौए से जाकर हरिकथा किस कारण सुनी। कहिए काकभुशुण्डि और गरुण इन दोनों हरि भक्तो की बात-चीत किस प्रकार हुई? पार्वती जी की सरल, सुंदर वाणी सुनकर शिव जी सुख प्राप्त कर आदर के साथ बोले हे सती! तुम धन्य हो, तुम्हारी बुद्धि अत्यंत पवित्र है।

 

 

 

 

श्री रघुनाथ जी के चरणों में तुम्हारा अत्यधिक प्रेम है। अब वह परम पवित्र इतिहास सुनो जिसे सुनने से सारे लोक के भ्रम का नाश हो जाता है तथा श्री राम जी के चरणों में विश्वास उत्पन्न होता है और मनुष्य बिना परिश्रम ही संसार रूपी समुद्र से तर जाता है।

 

 

 

 

पक्षीराज गरुण जी ने भी जाकर काकभुशुण्डि जी से प्रायः ऐसे ही प्रश्न किए थे। हे उमा! वह सब आदर सहित कहूंगा। तुम मन लगाकर सुनो।

 

 

 

 

मैंने जिस प्रकार यह भव से छुड़ाने वाली कथा सुनी हे सुमुखि! हे सुलोचिनी! वह प्रसंग सुनो। पहले तुम्हारा अवतार दक्ष के घर हुआ था तब तुम्हारा नाम सती था। दक्ष के यज्ञ में तुम्हारा अपमान हुआ। तब तुमने अत्यंत क्रोध करके अपने प्राण त्याग दिए थे फिर मेरे सेवको ने यज्ञ विध्वंस कर दिया था। वह सारा प्रसंग तुम जानती हो।

 

 

 

 

तब मेरे मन में बहुत सोच हुआ और हे प्रिये! मैं तुम्हारे वियोग से दुखी हो गया। मैं विरक्त भाव से सुंदर वन, पर्वत, नदी और तालाबों का दृश्य देखता फिरता था। सुमेरु पर्वत के उत्तर दिशा में और भी दूर एक बहुत ही सुंदर नील पर्वत है। उसके सुंदर स्वर्णमय शिखर है।

 

 

 

 

उनमे से चार सुंदर शिखर मेरे मन को बहुत ही अच्छे लगे। उन शिखरो में एक-एक पर बरगद, पीपल, पाकड़ और आम का एक-एक विशाल वृक्ष है पर्वत के ऊपर एक तालाब शोभित है जिसकी मणियों की सीढिया देखकर मन मोहित हो जाता है।

 

 

 

 

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