Nirmala novel Premchand Pdf / निर्मला उपन्यास Pdf

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सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

 

उसके भी पांच प्रकार की विद्याओ से उत्पन्न विकारो को श्री राम जी दूर करते है अर्थात सम्पूर्ण राम चरित्र की तो बात ही क्या है जो व्यक्ति पांच-सात चौपाइयों को भी समझकर उनका अर्थ हृदय में धारण कर लेता है उसके भी अविद्या जनित सारे क्लेश श्री राम जी दूर कर देते है।

 

 

 

 

परम सुंदर सुजान और कृपानिधान तथा जो अनाथो पर प्रेम करते है ऐसे एक श्री राम जी ही है। इनके समान निष्काम, निःस्वार्थ हित करने वाला सुहृद और मोक्ष देने वाला दूसरा कौन है? जिनकी लेश मात्र कृपा से मंद बुद्धि तुलसीदास ने परम शांति प्राप्त कर लिया। उन श्री राम जी के समान प्रभु कही भी नहीं है।

 

 

 

 

दोहा का अर्थ-

 

 

 

हे श्री रघुवीर! मेरे समान कोई दीन नहीं है और आपके समान कोई दीन दयाल नहीं है जो दीन का हित कर सके। ऐसा विचारकर हे रघुवंश मणि! मेरे जन्म-मरण के भयानक दुःख का हरण कर लीजिए। जैसे कामी को स्त्री प्रिय लगती है और लोभी को जैसे धन प्यारा लगता है। वैसे ही हे रघुनाथ जी! हे राम जी! आप निरंतर मुझे प्रिय लगिए।

 

 

 

 

श्लोक 

 

 

 

श्रेष्ठ कवि भगवान श्री शंकर जी पहले जिस दुर्गम मानस-रामायण की, श्री राम जी के चरण कमलो में नित्य निरंतर अनन्य भक्ति प्राप्त होने के लिए रचना किया था। उस मानस रामायण को श्री रघुनाथ जी नाम में निरत मानकर अपने अन्तः करण के अंधकार को मिटाने के लिए तुलसीदास जी ने इस मानस के रूप में भाषाबद्ध किया।

 

 

 

 

यह श्री राम चरित मानस पुण्य रूप करने वाला, सदा कल्याणकारी, विज्ञान और भक्ति को देने वाला, माया, मोह, मैल का नाश करने वाला, परम निर्मल प्रेम रूपी जल से परिपूर्ण है। जो मनुष्य भक्ति पूर्वक इस मानसरोवर में गोता लगाते है वह संसार रूपी सूर्य की प्रचंड किरणों से सुरक्षित हो जाते है।

 

 

 

 

पराये सुख को देखकर जो दुखी होता है वही क्षयी है। दुष्टता और मन की कुटिलता ही कोढ़ है। अहंकार अत्यंत दुःख देने वाला डमरू गांठ का रोग है। दंभ, कपट, मद और मान नसों का नहरुआ रोग है। तृष्णा बहुत भारी उदर वृद्धि रोग है। तीन प्रकार ‘पुत्र, धन और मान’ की इच्छाएं प्रबल तिजारी है। मत्सर और अविवेक दो प्रकार ज्वर है। इस प्रकार अनेक बुरे रोग है कहाँ तक कहूं।

 

 

 

 

दोहा का अर्थ-

 

 

 

एक रोग के वश होने से ही मनुष्य का अंत हो जाता है फिर यह तो बहुत से असाध्य रोग है। यह जीव को निरंतर कष्ट देते रहते है। ऐसी दसा में वह समाधि (शांति) को कैसे प्राप्त करे? नियम, धर्म, उत्तम आचरण, तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान तथा और भी कोटि औषधियां है। परन्तु हे गरुण जी! उनसे यह रोग नहीं मिटते।

 

 

 

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