पंचमुखी हनुमान कवच पाठ | Panchmukhi Hanuman Kavach Hindi Pdf

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Panchmukhi Hanuman Kavach Pdf

 

 

 

 

 

 

 

 

Skanda Purana in Hindi Pdf
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महावीर हनुमान जी सीता माता का पता लगाने के लिए समुद्र को लांघकर लंका में प्रवेश करने के उपरांत सीता माता को ढूंढने का प्रयास करने लगे परन्तु उन्हें सीता माता कही पर भी दिखाई नहीं पड़ी लेकिन उनकी दृष्टि एक ऐसे स्थान पर गयी जहां राम का नाम लिखा हुआ था और उस स्थान पर तुलसी का पौधा भी लगा हुआ था।

 

 

 

 

अतः पवनसुत को समझते देर नहीं लगी कि यहां कोई रामभक्त अवश्य है। उन्होंने उससे मिलने का निश्चय किया। उस समय लंकाधिराज रावण के लघु भ्राता विभीषण जी ने ‘राम-राम’ का उच्चारण किया। अब पवनपुत्र पूर्ण रूप से संतुष्ट हो गए कि महापुरुष से मिलने में किसी प्रकार की हानि नहीं होगी।

 

 

 

 

महावीर हनुमान जी ने विप्र रूप धारण किया फिर विभीषण जी से मिलने के लिए उसके निकट पहुंच गए। विप्र का रूप धारण करने के बाद पवनसुत जब विभीषण के पास गए तो एक विप्र को अपने सामने देखकर विभीषण ने उन्हें प्रणाम किया और उनकी कुशल क्षेम पूछने ले।

 

 

 

उन्होंने कहा – हे विप्र! आप मुझे भगवान के दास जान पड़ते है और इसका कारण यह है कि आपको देखकर हमारे मन में बहुत प्रीति उत्पन्न हो रही है या फिर आप भगवान राम में अनुराग रखने वाले हमारे भाग्य को संवारने आये है। विभीषण के मुख से ऐसा वचन सुनकर महावीर हनुमान ने अपना नाम उन्हें बताया तथा राम जी की पूरी कथा का वर्णन कर दिया।

 

 

 

जिसे सुनकर विभीषण की रोमावली खड़ी हो गयी और मन प्रसन्नता से भर गया। वह हनुमान जी से बोले कि – हे पवनपुत्र हनुमान! अब मुझे पूर्ण रूप से भरोसा हो गया है कि बिना प्रभु की कृपा से संत पुरुषो से मिलाप नहीं हो सकता है।

 

 

 

विभीषण हनुमान जी से बोले – मेरा शरीर तामसी है राक्षसी स्वभाव है और प्रभु के चरण कमलो में मेरी प्रीति भी नहीं है लेकिन भगवान ने हमारे ऊपर अवश्य ही कृपा किया है तभी आपने हठ पूर्वक हमे दर्शन दिया है। हनुमान जी बोले – हे विभीषण! सुनो, प्रभु की ऐसी रीति है कि वह अपने सेवक पर अवश्य ही प्रीति करते है।

 

 

 

अशोक वाटिका में हनुमान जी ने अपनी क्षुधा की तृप्ति के लिए सुमधुर फलो को खाया और कपि स्वभाव के कारण बहुत से वृक्षों को उखाड़कर धरती पर डाल दिया। वहां उपस्थित सुर द्रोही रावण के अनुचर जब महावीर हनुमान जी को रोकने का प्रयास किए तब हनुमान जी ने उनके लिए यमपुर जाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया।

 

 

 

कुछ अनुचर अपने प्राणो को बचाकर रावण के दरबार में उपस्थित होकर सारी स्थिति व्यथा के साथ कह सुनाई। रावण ने अपने ज्येष्ठ पुत्र मेघनाद को आदेश दिया कि वह जाकर देखे ऐसा कौन सा कपि हमारे उपवन में आया है जो अनुचरो को दण्डित कर उपवन को हानि पहुंचा रहा है।

 

 

 

अपने पिता असुराधिप रावण की आज्ञा मानकर अशोक उपवन में गया। वहां वह महावीर हनुमान से उसका घोर संग्राम हुआ। एक तरफ मायावी तामसी राक्षस मेघ की तरह गर्जना करने वाला और इंद्र को परास्त करने वाला इंद्रजीत और दूसरी तरफ मायापति भगवान के दूत अंजनी सुत हनुमान?

 

 

 

जिनके असीम शक्ति का दर्शन उनके बाल्य अवस्था में ही दिख गया था वह महावीर हनुमान मेघनाद के सारे प्रयासों को निष्फल करके अपने प्रहार से उसे मूर्छित होने के लिए विवश कर दिया। मूर्छा जाने के पश्चात मेघनाद ने महावीर हनुमान जी को किसी तरह से बाँधने के प्रयास में विफल रहने के उपरांत ब्रह्म शक्ति का प्रयोग किया।

 

 

 

रामभक्त हनुमान जी के समक्ष ब्रह्म शक्ति भी निष्फल हो सकती थी लेकिन ज्ञानियों में श्रेष्ठ हनुमान जी ने उस ब्रह्म शक्ति का निरादर नहीं किया और उस शक्ति का उचित सम्मान करते हुए खुद को ब्रह्म पाश के बंधन को सहर्ष स्वीकार कर लिया।

 

 

 

यहां पर शिव जी अपनी अर्धांगिनी माता पार्वती से कहते है – हे भवानी! सुनो, जिसके नाम का सुमिरन करते हुए ज्ञानी पुरुष भव-बंधन से छूटने का प्रयास करते है। उस परम पुरुष श्री राम जी का भक्त भला बंधन में कैसे आ सकता है? वह तो अपने प्रभु राम जी के कार्य को पूर्ण करने के लिए स्वयं ही ब्रह्म पाश में बंध गया।

 

 

 

 

पंचमुखी हनुमान कवच Pdf 

 

।। श्री गणेशाय नम: ।।

।। ॐ श्री हनुमते नमः ।।

ॐ अस्य श्रीपञ्चमुख हनुमतकवच मंत्रस्य ब्रहमा ऋषि: ।
गायत्री छंद्: । श्रीपञ्चमुख विराट हनुमान देवता| ह्रीम बीजम् ।
श्रींम शक्ति:। क्रौ कीलकम्। क्रूं कवचम्। क्रै अस्त्राय फ़ट् ।

।। इति दिग्बंध्: ।।

।। श्री गरूड उवाच् ।।

अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि श्रुणु सर्वांगसुंदरम् ।
यत्कृतं देवदेवेन ध्यानं हनुमत्: प्रियम् ।।
पञ्चवक्त्रं महाभीमं त्रिपंच नयनैर्युतम् ।
बाहुभिर्दशभिर्युक्तं सर्वकामार्थसिध्दिदम् ।।

पूर्वतु वानरं वक्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम् ।
दंष्ट्राकरालवदनं भ्रुकुटी कुटिलेक्षणम् ।।
अस्यैव दक्षिणं वक्त्रं नारसिंहं महाद्भुतम् ।
अत्युग्रतेजोवपुष्पं भीषणम भयनाशनम् ।।

पश्चिमं गारुडं वक्त्रं वक्रतुण्डं महाबलम् ।
सर्वनागप्रशमनं विषभूतादिकृन्तनम् ।।
उत्तरं सौकरं वक्त्रं कृष्णं दिप्तंनभोपमम् ।
पाताले सिंह बेतालं ज्वररोगादिकृन्तनम ।।

ऊर्ध्वं हयाननं घोरं दानवान्तकरं परम् ।
येन वक्त्रेण विप्रेन्द्र तारकाख्यमं महासुरम् ।।
जघानशरणं तस्यात्सर्वशत्रुहरं परम् ।

ध्यात्वा पंचमुखं रुद्रं हनुमन्तं दयानिधिम् ।।
खड्गं त्रिशुलं खट्वांगं पाशमंकुशपर्वतम् ।
मुष्टिं कौमोदकीं वृक्षं धारयन्तं कमण्डलुं ।।
भिन्दिपालं ज्ञानमुद्रा दसभिर मुनिपुंगवम् ।

एतान्यायुधजालानि धारयन्तं भजाम्यहम् ।।
प्रेतासनोपविष्टं तं सर्वाभरण्भुषितम् ।
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम ।।
सर्वाश्चर्यमयं देवं हनुमद् विश्वतोमुखम् ।

पंचास्यमच्युतमनेकविचित्रवर्ण वक्त्रं शशांकशिखरं कपिराजवर्यम् ।
पीताम्बरादिमुकुटैरूप शोभितांगं पिंगाक्षमाद्यमनिशं मनसा स्मरामि ।।
मर्कटेशं महोत्साहं सर्वशत्रुहरं परम् । शत्रुं संहरमां रक्ष श्री मन्नापदमुध्दर ।।
ओम हरिमर्कट मर्कट मंत्रमिदं परिलिख्यति लिख्यति वामतले ।।
यदि नश्यति नश्यति शत्रुकुलं यदि मुंच्यति मुंच्यति वामलता ।।

ओम हरिमर्कटाय स्वाहा ओम नमो भगवते पंचवदनाय पूर्वकपिमुखाय सकलशत्रुसंहारकाय स्वाहा ।
ओम नमो भगवते पंचवदनाय दक्षिणमुखाय करालवदनाय नरसिंहाय सकलभूतप्रमथनाय स्वाहा ।
ओम नमो भगवते पंचवदनाय पश्चिममुखाय गरूडाननाय सकलविषहराय स्वाहा ।
ओम नमो भगवते पंचवदनाय उत्तरमुखाय आदिवराहाय सकलसंपत्कराय स्वाहा ।
ओम नमो भगवते पंचवदनाय उर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय सकलजनवशकराय स्वाहा ।

ॐ अस्य श्री पञ्चमुखहनुमत् मन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषि: अनुष्टुपछन्दः पञ्चमुख वीर हनुमान देवता हनुमान इति बीजं वायुपुत्रः इति शक्तिः अंजनी सूत इति कीलकम श्रीरामदूत हनुमत प्रसाद सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।

ॐ अंजनी सुताए अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । हृदयाय नमः ।
ॐ रुद्रमूर्तये तर्जने भयाम नमः । शिरसे स्वाहा ।
ॐ वायु पुत्राये तर्जनीभ्यां नमः । शिखायै वौषट ।
ॐ अग्निगर्भये अनामिकाभ्यां नमः । कवचाय हुम् ।

ॐ रामदूताय कनिष्ठिकाभ्यां नमः । नेत्रत्रयाय वौषट ।
ॐ पंचमुख हनुमते करतलेपृष्ठाभ्यां नमः ।अस्त्राय फट ।
इदं कवचं पठित्वा तु महाकवचं पठेन्नरः ।
एकवारं जपे स्त्रोत्रं सर्वशत्रुनिवारणम् ।।

द्विवारं तु पठेन्नित्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धनम् ।
त्रिवारं च पठेत नित्यं सर्वसंपत्करं शुभम ।।
चतुर्वारं पठेन्नित्यं सर्वरोगनिवारणम् ।
पञ्चवारं पठेन्नित्यं सर्वलोक वशमकरम् ।।

षड्वारं तु पठेन्नित्यं सर्वदेव वशमकरम् ।
सप्तवारं पठेन्नित्यं सौभाग्यदायकम् ।।
अष्टवारं पठेन्नित्यं सर्व अष्टकामार्थसिद्धिदम् ।
नववारं पठेन्नित्यं सर्वैश्वर्य प्रदायकम् ।।
दशवारं च पठेन्नित्यं त्रैलोक्य ज्ञानदर्शनम् ।
एकादशं पठेन्नित्यं सर्वसिद्धिं लभेन्नरः ।।

।। ओम श्रीपंचमुखहनुमंताय आंजनेयाय नमो नम: ।।

।। श्रीपञ्चमुखी हनुमत्कवच समाप्तं ।।

 

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