Patanjali Yoga Sutra In Hindi Pdf / महर्षि पतंजलि योग सूत्र Pdf

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Patanjali Yoga Sutra In Hindi Pdf Download

 

 

 

Patanjali Yoga Sutra In Hindi Pdf
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

परन्तु शिव की माया से मोहित होने के कारण वे उस पूर्व वृतांत को स्मरण न कर सके। वास्तव में इस संसार के भीतर सभी प्राणियों के लिए शंभु की माया को जानना अत्यंत कठिन है। जिसने भगवान शंकर के चरणों में अपने आप को समर्पित कर दिया है।

 

 

 

 

उस भक्त को छोड़कर शेष सारा जगत उनकी माया से मोहित हो जाता है। नारद जी भी भगवान शंकर की कृपा से वहां चिर काल तक तपस्या में लगे रहे। जब उन्होंने अपनी तपस्या को पूर्ण हुई समझा तब वे मुनि उससे विरत हो गए। कामदेव पर मेरी विजय हुई ऐसा मानकर उन मुनीश्वर के मन में व्यर्थ ही गर्व हो गया।

 

 

 

 

भगवान शंकर की माया से मोहित होने के कारण उन्हें यथार्थ बात का ज्ञान नहीं रहा। उस माया से अत्यंत मोहित हो मुनि शिरोमणि नारद अपना काम विजय संबंधी वृतांत बताने के लिए तुरंत ही कैलास पर्वत पर गए। उस समय वे मद से उन्मत हो रहे थे।

 

 

 

 

वहां रुद्रदेव को नमस्कार करके गर्व से भरे हुए मुनि ने अपने आपको महात्मा मानकर तथा अपने ही प्रभाव से कामदेव पर अपनी विजय हुई समझकर उनसे सारा वृतांत कह सुनाया। वह सब सुनकर भक्त वत्सल भगवान शंकर ने नारद जी से जो अपनी ही माया से मोहित होने के कारण कामविजय के यथार्थ कारण को नहीं जानते थे और अपने विवेक को भी खो बैठे थे।

 

 

 

 

रूद्र बोले – तात नारद! तुम बड़े विद्वान हो, धन्यवाद के पात्र हो। परन्तु मेरी यह बात ध्यान देकर सुनो। अब से फिर कभी ऐसी बात कही भी न कहना। विशेषतः भगवान विष्णु के सामने इसकी चर्चा कदापि न करना। तुमने मुझसे अपना जो वृतांत बताया है उसे पूछने पर भी दूसरों के सामने न कहना।

 

 

 

 

यह सिद्धि संबंधी वृतांत सर्वथा गुप्त रखने योग्य है। इसे कभी किसी पर प्रकट नहीं करना चाहिए। तुम मुझे विशेष प्रिय हो इसीलिए अधिक जोर देकर मैं तुम्हे यह शिक्षा देता हूँ और इसे न कहने की आज्ञा देता हूँ क्योंकि तुम विष्णु भगवान के भक्त हो और उनके भक्त होते हुए ही मेरे अत्यंत अनुगामी हो।

 

 

 

 

इस प्रकार बहुत कुछ कहकर संसार की सृष्टि करने वाले भगवान रूद्र ने नारद जी को शिक्षा दी। अपने वृतांत को गुप्त रखने के लिए उन्हें समझाया बुझाया परन्तु वे शिव की माया से मोहित थे। इसलिए उन्होंने उनकी दी हुई शिक्षा को अपने लिए हितकर नहीं माना।

 

 

 

 

तदनन्तर मुनि शिरोमणि नारद ब्रह्मलोक में गए। वहां ब्रह्मा जी को नमस्कार करके उन्होंने कहा – पिताजी! मैंने अपने तपोबल से कामदेव को जीत लिया है। उनकी वह बात सुनकर ब्रह्मा जी ने भगवान शंकर के चरणारबिन्दो का चिंतन किया और सारा कारण जानकर अपने पुत्र को यह सब कहने से मना किया।

 

 

 

 

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