Patanjali Yoga Sutra Pdf / पतंजलि योग सूत्र Pdf

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Patanjali Yoga Sutra Pdf Download

 

 

पुस्तक का नाम  Patanjali Yoga Sutra Pdf
पुस्तक के लेखक  ज्ञान प्रकाश शास्त्री 
फॉर्मेट  Pdf 
भाषा  हिंदी 
साइज  9.13 Mb 
पृष्ठ  250  
श्रेणी  आयुर्वेद 

 

 

 

 

Patanjali Yoga Sutra Pdf
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Patanjali Yoga Sutras Pdf In Hindi By Vivekananda
पतंजलि योग सूत्र पीडीऍफ़ डाउनलोड

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

अब असन्तो का स्वभाव सुनो कभी भूलकर भी उनकी संगति नहीं करनी चाहिए। उनका संग सदा सुख देने वाला होता है। जैसे हरहाई गाय कपिला गाय को अपने संग से नष्ट कर डालती है। बुरे लोगो के हृदय में बहुत अधिक संताप रहता है। वह पराई सुख-संपत्ति देखकर सदा ही संतप्त रहते है।

 

 

 

 

वह जहां किसी की निंदा सुनते है वहां ऐसे हर्षित होते है मानो रास्ते में उन्हें निधि मिल गयी हो। वह काम, क्रोध, मद और लोभ के परायण तथा निर्दयी कपटी कुटिल और पाप का घर होते है। वह बिना कारण ही सभी से बैर करते है। जो भलाई करता है उसके साथ भी बुराई करते है। वह झूठे लेन-देन करने में पारंगत होते है।

 

 

 

 

उनका झूठा ही भोजन होता है और झूठा ही चबेना होता है। अर्थात वह लेन-देन के व्यापार में झूठ का आश्रय लेकर दूसरों का हक ले लेते है और झूठी डींग हांकते हुए कि हमने लाखो रुपये ले लिए करोडो का दान कर दिया और इसी प्रकार उनका भोजन होता है कि चने की रोटी खाकर कहते है कि आज खूब बढ़िया भोजन करके आये है।

 

 

 

 

अथवा चबेना चबाकर रह जाते है और कहते है कि हमे बढियाँ भोजन से वैराग्य है इत्यादि। मतलब यह कि वह सभी बातो में झूठ ही बोला करते है जैसे मोर बहुत मीठा बोलता है परन्तु उसका हृदय इतना कठोर होता है कि विषैले सर्प को भी भक्षण कर जाता है। वैसे ही वह भी ऊपर से मीठे बोलते है और हृदय में बहुत निर्दयी होते है।

 

 

 

 

वह दूसरों से द्रोह करते है पराये धन तथा पराई निंदा में आसक्त रहते है। वह पामर और पापमय मनुष्य नर शरीर धारण किए हुए राक्षस ही है।

 

 

 

 

वह लोभ से ही सदा घिरे हुए रहते है लोभ ही उनका ओढ़ना और लोभी ही उनका बिछावन होता है। वह पशु के समान आहार और मैथुन के ही परायण होते है। उन्हें यमपुरी का भय नहीं लगता है। यदि वह किसी की बड़ाई सुन लेते है तो वह ऐसी दुःख भरी साँस लेते है मानो उन्हें जूड़ी आ गयी हो।

 

 

 

 

और जब किसी को विपत्ति में देखते है तब ऐसे सुखी होते है मानो संसार भर के राजा हो गए हो। वह स्वार्थ परायण, परिवार वालो के विरोधी, काम और लोभ के कारण लम्पट और अत्यंत क्रोधी होते है। वह माता, पिता, गुरु और ब्राह्मण किसी को भी नहीं मानते है। वह आप तो नष्ट होते ही है और अपने संग से दूसरो को भी नष्ट कर देते है।

 

 

 

 

मोह वश दूसरों से द्रोह करते है। उन्हें न तो संतो का संग अच्छा लगता है न भगवान की कथा ही सुहाती है। वह अगुणो के भंडार, मंदबुद्धि, रागयुक्त कामी, वेदो के निंदक और जबरदस्ती पराये धन को लूटने वाले होते है। परन्तु वह ऊपर से सुंदर वेश धारण किए हुए रहते है।

 

 

 

 

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