Pradosh Vrat Katha Pdf | प्रदोष व्रत कथा Pdf

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Pradosh Vrat Katha Pdf 

 

 

 

 

 

 

 

विदर्भ देश के राजकुमार का नाम धर्मगुप्त। उसके पिता का सारा राज्य शत्रुओ ने छीन लिया था। वह दुखी होकर इधर-उधर भटक रहा था। एक पुजारी की विधवा पत्नी अपने पुत्र के साथ भिक्षाटन करते हुए संध्या के समय घर लौट रही थी। उसकी मुलाकात धर्मगुप्त नामक लड़के से हुई जो परेशान और भटक रहा था।

 

 

 

 

पुजारी की विधवा ने उसे भी अपने साथ रख लिया तथा पुत्रवत स्नेह के साथ उसे अपने पास रखकर उसकी भी देखभाल करने लगी। एक शांडिल्य ऋषि के प्रदोष व्रत की चर्चा हो रही थी। वह पुजारी की स्त्री अपने दोनों पुत्रो के साथ आश्रम में पहुंच गयी।

 

 

 

 

वहां उसने भी शांडिल्य ऋषि से प्रदोष व्रत के विषय में सुना और उसकी विधि की जानकारी प्राप्त किया तथा घर आकर वह भी प्रदोष व्रत करने लगी। एक बार दोनों बालक घूमते हुए जंगल में चले गए। शाम होने पर पुजारी का बेटा घर लौट आया लेकिन वह राजकुमार जंगल में ही रह गया।

 

 

 

 

उस जंगल में गंधर्व परिवार आया हुआ था। गंधर्व कन्याये आपस में क्रीड़ा कर रही थी। वह राजपुत्र उनकी क्रीड़ा देखने में तल्लीन हो गया था। उसे घर पहुंचने में विलंब हो गया था। दूसरे दिन फिर गंधर्व कन्याओं का क्रीड़ा का अवलोकन करने के उद्देश्य से राजकुमार फिर जंगल में पहुंच गया।

 

 

 

 

वहां अपने माता-पिता के साथ एक कन्या बात कर रही थी उसका नाम अंशुमति थी। अंशुमति के माता-पिता विदर्भ के राजकुमार को पहचान गए और बोले आपका नाम धर्मगुप्त है और आप विदर्भ के रहने वाले है। शिव जी की कृपा से  हम अपनी पुत्री का पाणिग्रहण आपके साथ करना चाहते है क्या आप इसके लिए सहमत है?

 

 

 

 

राजकुमार धर्मगुप्त की सहमति से गंधर्व दम्पति ने अपनी पुत्री अंशुमति का पाणिग्रहण राजकुमार के साथ कर दिया। कुछ समय के उपरांत धर्मगुप्त ने गंधर्व की सहायता और उसकी विशाल सेना के साथ विदर्भ पर आक्रमण कर दिया तथा घनघोर संग्राम के पश्चात विजय श्री का वरण किया।

 

 

 

 

फिर राजकुमार धर्मगुप्त ने पुजारी की स्त्री और पुत्र को अपने महल में आदर के साथ लाया और राज्य करने लगा। धर्मगुप्त की पत्नी अंशुमति ने इन सभी बातो का कारण जानना चाहा तब धर्मगुप्त बोला – यह सब प्रदोष व्रत की महिमा का फल है।

 

 

 

 

प्रदोष व्रत के प्रभाव से ही हमारी सारी कठिनायों का अंत होकर पुनः राज्य की प्राप्ति हुई। उसी दिन से प्रदोष व्रत की प्रतिष्ठा और महत्व बढ़ गया। यह व्रत स्त्री और पुरुष दोनों कर सकते है। प्रदोष व्रत करने से पाप क्षीण होकर समाप्त हो जाते है तथा पुण्य का उदय होता है अभीष्ट की प्राप्ति होती है।

 

 

 

 

प्रदोष व्रत कथा Pdf Download

 

 

 

 

Pradosh Vrat Katha Pdf
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