Sai Baba Books in Hindi Pdf / साईं बाबा बुक्स Pdf

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

तपस्वी द्वारा प्रदान ककी गयी अभिमंत्रित लकड़ी बिल्लू के पास थी अतः उसे मटका ढूंढने में कठिनाई नही हुई। वह मिलन की नजर बचाते हुए मटका उठा लिया फिर वहां से चला गया।

 

 

 

 

मिलन उसे रोकने का प्रयास नहीं किया। उसे मालूम था कि अब इस मटके में कुछ भी नहीं है। बिल्लू ने वह बेढंगा काला मटका ले जाकर दीनू को दे दिया।

 

 

 

 

दीनू बहुत प्रसन्न हो गया। उस मटके में सुमन परी के नहीं रहने से कोई मूल्य नहीं रह गया था। दीनू उसे तोड़ने का प्रयास किया तो मटका एक झटके म ही टूटकर बिखर गया। दीनू का उद्देश्य पूरा हो चुका था।

 

 

 

 

सुमन परी क्रोध से भरी हुई थी। बहुत वेग के साथ तपस्वी के पास पहुँच गयी। सुमन के वहां पहुँचते ही तीव्र वेग से आंधी चलने लगी। तपस्वी का आश्रम भी उस आंधी के वेग से ऊपर आकाश में उड़ गया। तपस्वी को ज्ञात हो चुका था कि यह सब सुमन परी के आने से पूर्व का प्रभाव है जो उसके क्रोध का परिचय दे रहा है।

 

 

 

 

तपस्वी निश्चल भाव से बैठे हुए थे। उसी पल उनके सामने एक प्रकाश पुंज आकाश से उतरने लगा और अगले पल वह प्रकाश पुंज एक अद्वितीय सुंदर परी में बदल गया था। परी ने तपस्वी को प्रणाम किया – प्रणाम महाराज! तपस्वी ने परी को आशीर्वाद दिया सुखी भव।

 

 

 

 

परी तपस्वी से बोली – आपने सुखी भव का आशीर्वाद दिया फिर आपने ही क्यों विघ्न डाल दिया हमारे सुख में? तपस्वी परी से बोले – पुत्री! कोई भी जब हमारे सामने दुखी अवस्था में आता है तब मैं अपनी क्षमता के अनुसार उस व्यक्ति के दुःख को दूर करने का प्रयास करता हूँ।

 

 

 

 

सुमन परी तपस्वी से बोली – आपका यह कैसा प्रयास है जो एक व्यक्ति को सुख प्रदान करते हुए दूसरे को दुखी बना देता है। महात्मा सुमन परी से बोले – मैं तुम्हारा अभिप्राय समझ रहा हूँ पुत्री! तुम्हारा यह कष्ट कुछ दिनों के बाद अवश्य समाप्त हो जायेगा फिर तुम अपने इच्छित जगह पर रह सकोगी और परियो की रानी के साथ ही अन्य परियो का तुम्हे सहयोग प्राप्त होता रहेगा।

 

 

 

परी महात्मा से बोली – आपने जो हमारा स्थान अलग किया है अगर मैं चाहूँ तो आपका यह प्रयास विफल कर सकती हूँ लेकिन मैं प्रकृति के विरुद्ध ऐसा कोई भी कार्य नहीं कर सकती हूँ जो किसी के लिए संकट उत्पन्न करे। महात्मा परी से बोले – पुत्री! मैं तुम्हारी शक्ति से परिचित हूँ।

 

 

 

 

यह तुम्हारी महानता है जो सक्षम होते हुए भी हमारा प्रतिरोध नहीं किया। परी महात्मा से बोली – महाराज! आपने दीनू को वह मटका अपने पास लेकर आने के लिए कहा था लेकिन वह कुटिल व्यक्ति ने उस मटके को तोड़ दिया है। आपने हमारे रहने का आधार हमसे विलग कर दिया।

 

 

 

 

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