No 1 Sanskrit Subhashit Sangrah Pdf Free

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Sanskrit Subhashit Sangrah Pdf Free

 

 

 

पुस्तक का नाम  संस्कृत सुभाषित संग्रह
पुस्तक के लेखक  सुखसागर 
भाषा  संस्कृत 
श्रेणी  बुक 
साइज  4 Mb
फॉर्मेट  Pdf
पृष्ठ  220

 

 

 

2015.549856.Subhashit-Sangrah

 

 

 

संस्कृत सुभाषित संग्रह Pdf Download

 

लोक व्यवहार बुक इन हिंदी Pdf Download

 

 

 

 

 

 

 

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Sanskrit Subhashit Sangrah Pdf
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

वह वन और पर्वत स्वाभाविक रूप से ही सुंदर, मंगलमय, पवित्र को भी पवित्र करने वाला है। उसकी महिमा कैसे कही जाय, जहां सुख के सागर श्री राम जी ने निवास किया है।

 

 

 

3- क्षीर सागर को त्यागकर और अयोध्या को छोड़कर जहां सीता जी, लक्ष्मण जी और श्री राम जी आकर रहे, उस वन की परम शोभा को उसको हजार मुख वाले लाखो शेष जी हो तो वह भी नहीं कह सकते है।

 

 

 

4- उसे भला मैं (कवि) किस प्रकार से वर्णन कर सकता हूँ। कही पोखरे का क्षुद्र कछुआ भी मंदराचल को उठा सकता है? लक्ष्मण जी मन, वचन और कर्म से श्री राम जी की सेवा करते है, उनके शील और स्नेह का वर्णन नहीं किया जा सकता है।

 

 

 

139- दोहा का अर्थ-

 

 

 

 

क्षण-क्षण में श्री सीता राम जी के चरण देखकर और ऊपर उनका स्नेह जानकर लक्ष्मण जी को स्वप्न में भाइयो, माता-पिता और घर की याद नहीं आती है।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- श्री राम जी के साथ सीता जी – अयोध्यापुरी कुटुंब के लोग और घर की याद को भूलकर बहुत ही सुखी रहती है। प्रत्येक क्षण श्री राम जी के चन्द्रमा के समान मुख को देखकर सीता जी उसी तरह परम प्रसन्न रहती है जैसे चकोर कुमारी चन्द्रमा को देखकर प्रसन्न होती है।

 

 

 

 

2- स्वामी का प्रेम अपने प्रति नित्य बढ़ता हुआ देखकर सीता जी इस प्रकार हर्षित होती जिस प्रकार दिन में चकवी हर्षित होती है। सीता जी का मन श्री राम जी के चरणों में अनुरक्त है इसलिए वन भी उन्हें हजारो अवध के समान प्रिय लगता है।

 

 

 

3- प्रियतम श्री राम जी के साथ पर्ण कुटी प्यारी लगती है। मृग और पक्षी प्यारे कुटुंबियो के समान लगते है। मुनियो की स्त्रियां सास के समान, श्रेष्ठ मुनि ससुर के समान और कंद मूल और फल का आहार उनको अमृत के समान लगता है।

 

 

 

4- स्वामी के साथ सुंदर साथरी (कुश और पत्तो की सेज) सैकड़ो कामदेवों की सेज के समान ही सुख प्रदान करने वाली है।  पूर्वक देखने से ही जीव लोकपाल हो जाता है। भला उनको कही भोग विलास मोहित कर सकते है।

 

 

 

140- दोहा का अर्थ-

 

 

 

जिन श्री राम जी के स्मरण मात्र से ही भक्त जन सभी भोग विलास को तिनके के समान त्याग कर देते है। उन श्री राम जी की प्रिय पत्नी और जगत की माता सीता जी के लिए इस भोग विलास का त्याग कुछ भी आश्चर्य नहीं है।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- सीता जी और लक्ष्मण जी को जिस प्रकार सुख मिले, श्री रघुनाथ जी वही करते और वही कहते है। भगवान प्राचीन कथाये और कहानियां कहते है और लक्ष्मण जी और सीता जी अत्यंत सुख मानकर सुनते है।

 

 

 

2- जब-जब श्री राम जी अयोध्या की याद करते है, तब-तब उनके नेत्रों में जल भर आता है। माता-पिता कुटुंबियो और भाइयो तथा भरत के प्रेम, शील और सेवा भाव को याद करके।

 

 

 

 

3- कृपा के समुद्र श्री राम जी दुखी हो जाते है, किन्तु फिर कुसमय समझकर धीरज धारण कर लेते है। श्री राम जी को दुखी देखकर सीता जी और लक्ष्मण जी भी व्याकुल हो जाते है। जैसे किस मनुष्य की परछाही भी उस मनुष्य के समान ही चेष्टा करती है।

 

 

 

4- तब धीर कृपालु और भक्तो के हृदय को शीतल करने वाले, चंदन स्वरुप रघुकुल को आनंदित करने वाले श्री राम जी की प्यारी पत्नी और भाई लक्ष्मण की दशा देखकर कुछ पवित्र कथाये कहने लगते है जिन्हे सुनकर लक्ष्मण जी और सीता जी सुख प्राप्त करते है।

 

 

 

 

141- दोहा का अर्थ-

 

 

 

लक्ष्मण जी और सीता जी सहित श्री राम जी पर्ण कुटी में ऐसे सुशोभित हो रहे है जैसे अमरावती में इंद्र अपनी पत्नी शची और जयंत के साथ निवास करता है।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- श्री राम जी सीता जी और लक्ष्मण जी को उसी भांति संभालकर रखते है जैसे पलके नेत्र की पुतलियों को संभालकर रखते है। इधर लक्ष्मण जी और सीता जी राम जी की सेवा इस प्रकार करते है जैसे अज्ञानी मनुष्य शरीर की सेवा करता है।

 

 

 

2- पशु-पक्षी, देवता और तपस्वियों का हित चाहने वाले प्रभु वन में निवास कर रहे है। तुलसीदास जी कहते है कि मैंने श्री राम जी का सुंदर रूप से वनगमन कहा। अब जिस प्रकार सुमत्र अयोध्या में आये वह कथा सुनो।

 

 

 

3- प्रभु श्री राम जी को पहुंचाकर जब निषाद राज लौटा, तब आकर उसने रथ को मंत्री सुमंत्र के साथ देखा। मंत्री को व्याकुल देखकर निषाद को जिस प्रकार दुःख हुआ वह तो कहने योग्य ही नहीं है।

 

 

 

4- निषाद को अकेला आया देखकर – सुमत्र, हा राम! हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण! पुकारते हुए बहुत ही व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़े। रथ के घोड़े दक्षिण दिशा की ओर (जिधर श्री राम जी गए थे) देखकर इस तरह हिनहिनाते है मानो बिना पंख के पक्षी व्याकुल हो रहे हो।

 

 

 

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