Satyanarayan Katha Pdf / सत्यनारायण व्रत कथा Pdf

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सत्यनारायण व्रत कथा Pdf Download

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

परी महात्मा से बोली – आपने जो हमारा स्थान अलग किया है अगर मैं चाहूँ तो आपका यह प्रयास विफल कर सकती हूँ लेकिन मैं प्रकृति के विरुद्ध ऐसा कोई भी कार्य नहीं कर सकती हूँ जो किसी के लिए संकट उत्पन्न करे। महात्मा परी से बोले – पुत्री! मैं तुम्हारी शक्ति से परिचित हूँ।

 

 

 

 

यह तुम्हारी महानता है जो सक्षम होते हुए भी हमारा प्रतिरोध नहीं किया। परी महात्मा से बोली – महाराज! आपने दीनू को वह मटका अपने पास लेकर आने के लिए कहा था लेकिन वह कुटिल व्यक्ति ने उस मटके को तोड़ दिया है। आपने हमारे रहने का आधार हमसे विलग कर दिया।

 

 

 

 

परी के स्वरुप में यहां मैं ज्यादा समय तक नहीं रुक सकती मुझे परीलोक वापस जाना होगा। कुछ दिन के बाद मिलन यहां आएगा आपको उसकी सहायता अवश्य करना होगा महाराज। इतना कहकर सुमन परी एक प्रकाश पुंज के रूप में परिवर्तित हो गयी।

 

 

 

 

वह प्रकाश पुंज आकाश की तरफ बढ़ने लगा। महात्मा जी उस प्रकाश पुंज को जाते हुए देखकर विचलित हो उठे और सोचने लगे इतनी शक्ति संपन्न होने पर भी उनके सामने कितनी सुशीलता का परिचय दिया था। मिलन के कान में सुमन परी के द्वारा कहे गए शब्द गूंज रहे थे।

 

 

 

 

उसे किसी से सरोकार नहीं रह गया था। उसके अंदर बहुत व्यग्रता बढ़ गयी थी। मिलन अति शीघ्र ही उस तपस्वी महात्मा के पास पहुंचना चाहता था जो उसे सुमन परी से मिलने का उपाय बता सकता था। काफी प्रयास करने के बाद मिलन नदी के दूसरे किनारे पर स्थित आश्रम पर पहुँच गया।

 

 

 

 

जहां तपस्वी अपनी साधना में लीन थे। उनका क्षतिग्रस्त आश्रम देखकर मिलन दुखी हो गया। उसने आश्रम को नए सिरे से बनाने का प्रयास शुरू कर किया। चार दिन के अथक प्रयास से उसने महात्मा के आश्रम को सुंदर स्वरुप प्रदान कर दिया।

 

 

 

 

जब महात्मा अपनी साधना करके उठे तब अपने आश्रम को अच्छी अवस्था में देखकर बहुत खुश हुए और बोले – कौन है भाई! जो हमारे आश्रम को इतने सुंदर ढंग से बनाया है वह हमारे समक्ष आ जाये। महात्मा की बात सुनकर मिलन आश्रम की ओट से निकलकर सामने आया फिर महात्मा के चरणों में गिर पड़ा।

 

 

 

महात्मा ने उसे उठाया और प्यार से पूछा – पुत्र! तुम्हे क्या दुःख है? हमे बताओ मैं तुम्हारी सेवा से बहुत प्रसन्न हूँ। मिलन महात्मा से कहने लगा – मुझे सुमन परी चाहिए जो दीनू के कपट पूर्ण व्यवहार से मुझसे विलग होने के लिए मजबूर हो गयी और हमारा साथ छोड़कर चली गयी।

 

 

 

 

महात्मा बोले – मिलन! यह कार्य मेरे लिए संभव नहीं है लेकिन मैं तुम्हे उपाय अवश्य ही बताऊंगा। तुम यहां से दो योजन पूर्व जाओ वहां इसी नदी के किनारे पर हमारे गुरु जी का आश्रम है वह तुम्हारी सहायता अवश्य करेंगे। तुम जितना ही आगे बढ़ोगे उतना ही घनघोर जंगल मिलता जायेगा लेकिन तुम धैर्य के साथ चलते जाना।

 

 

 

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