Shiv Tandav Stotram Pdf / शिव तांडव स्तोत्रम Pdf

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Shiv Tandav Stotram Pdf Download

 

 

 

पुस्तक का नाम  Shiv Tandav Stotram Pdf
पुस्तक के लेखक  रावण 
भाषा  हिंदी 
साइज  280 Kb 
पृष्ठ  13 
श्रेणी  काव्य 
फॉर्मेट  Pdf 

 

 

 

Shiv Tandav Stotram Pdf
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

बड़े भाग्य से यह मनुष्य शरीर मिला है। सब ग्रंथो ने यही कहा है कि यह शरीर देवताओ को दुर्लभ है और बड़ी कठिनता से मिलता है। यह साधना का धाम और मोक्ष का दरवाजा है। इसे प्राप्त कर जिसने परलोक न  बना लिया।उस परलोक में दुःख मिलता है, सिर पीटकर पछताता है तथा अपना दोष न समझकर काल पर, कर्म पर और ईश्वर पर मिथ्या दोष लगाता है।

 

 

 

 

हे भाई! इस शरीर के प्राप्त होने का फल विषय भोग नहीं है। इस जगत के भोग की तो बात ही क्या? स्वर्ग का भोग भी थोड़ा है और अंत में दुःख देने वाला है। अतः जो लोग मनुष्य शरीर प्राप्त करने पर भी विषयो में मन लगाते है, वह मुर्ख अमृत के बदले में विष लेते है।

 

 

 

 

जो पारस मणि को खोकर बदले में गुंजा ‘घुंघची’ लेता है, उसको कभी कोई बुद्धिमान नहीं कहता है। यह अविनाशी जीव ‘अंडज, स्वेदज, जरायुज, उद्भिज्ज’ चार खानो और चौरासी लाख योनियों में चक्कर लगाता रहता है। माया की प्रेरणा से काल, कर्म, स्वभाव और गुण से घिरा हुआ यह सदा ही भटकता रहता है।

 

 

 

 

बिना कारण के ही स्नेह करने वाले ईश्वर कभी विरले ही दया करके इसे मनुष्य का शरीर देते है। यह मनुष्य का शरीर भव सागर से तरने के लिए जहाज है। मेरी कृपा के अनुकूल वायु है। सदगुरु ही इस मजबूत जहाज के कर्णधार है। इस प्रकार दुर्लभ और कठिनता से मिलने वाले साधन सुलभ होकर भगवत्कृपा से सहज ही उसे प्राप्त हो गए है।

 

 

 

 

जो मनुष्य ऐसे साधन प्राप्त करने पर भी भवसागर से न तरे, वह कृतघ्न और मंदबुद्धि है और आत्महत्या करने वाले की गति को प्राप्त होता है। यदि परलोक में और यहां दोनों जगह सुख चाहते है तो मेरे वचन सुनकर उन्हें हृदय में दृढ़ता पकड़कर रखो। हे भाई! यह मेरी भक्ति का मार्ग सुलभ और सुखदायक है पुराणों और वेदो ने इसे गाया है। ज्ञान अगम है और उसे प्राप्त करने में अनेको विघ्न है।

 

 

 

 

उसका साधन कठिन है और उसमे मन के लिए कोई आधार नहीं है। बहुत कष्ट करने पर कोई उसे प्राप्त कर भी लेता है तो वह भी भक्ति रहित होने से मुझको प्रिय नहीं होता। भक्ति स्वतंत्र है और सब सुखो का भंडार है। परन्तु संतो के संग के बिना प्राणी इसे नहीं प्राप्त कर सकते है और पुण्य समूह के बिना संत नहीं मिलते।

 

 

 

 

सत्संगित ही जन्म-मरण के चक्र का अंत करती है। जगत में पुण्य केवल एक है उसके समान दूसरा नहीं है। वह है – मन, कर्म और वचन से ब्राह्मणो के चरणों की पूजा करना। जो कपट त्याग करके ब्राह्मणो की सेवा करता है। उस पर मुनि और देवता प्रसन्न रहते है।

 

 

 

 

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