Surendra Mohan Pathak Sudhir Series Pdf Download

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

अतः उन्होंने महान उत्सव का आयोजन किया था। उनकी कन्या का वरण करने के लिए उत्सुक हो चारो दिशाओ से बहुत से राजकुमार पधारे थे जो नाना प्रकार की वेशभूषा तथा सुंदर शोभा से प्रकाशित हो रहे थे। उन राजकुमारों से वह नगर भरा पूरा दिखाई देता था।

 

 

 

 

ऐसे सुंदर राजनगर को देख नारद जी मोहित हो गए। वे राजा शीलनिधि के द्वार पर गए। मुनि शिरोमणि नारद को आया देख महाराज शीलनिधि ने श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासन पर बिठाकर उनका पूजन किया। तत्पश्चात अपनी सुंदरी कन्या को  जिसका नाम श्रीमती था।

 

 

 

 

बुलवाया और उससे नारद जी के चरणों में प्रणाम करवाया। उस कन्या को देखकर नारद मुनि चकित हो गए और बोले – राजन! यह देवकन्या के समान सुंदरी महाभागा कन्या कौन है? उनकी यह बात सुनकर राजा ने हाथ जोड़कर कहा – मुने! यह मेरी पुत्री है। इसका नाम श्रीमती है।

 

 

 

 

अब इसके विवाह का समय आ गया है। यह अपने लिए सुंदर वर चुनने के निमित्त स्वयंवर में जाने वाली है। इसमें सब प्रकार के शुभ लक्षण लक्षित होते है। महर्षे! आप इसका भाग्य बताइये। राजा के इस प्रकार पूछने पर काम से विह्वल हुए मुनिश्रेष्ठ नारद उस कन्या को प्राप्त करने की इच्छा मन में लिए राजा को संबोधित करके इस प्रकार बोले।

 

 

 

 

आपकी यह पुत्री समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न है परम सौभाग्यवती है। अपने महान भाग्य के कारण यह धन्य है और साक्षात् लक्ष्मी की भांति समस्त गुणों की आगार है। इसका भावी पति निश्चय ही भगवान शंकर के समान वैभवशाली, सर्वेश्वर, किसी से पराजित न होने वाला, वीर, काम विजयी तथा सम्पूर्ण देवताओ में श्रेष्ठ होगा।

 

 

 

 

ऐसा कहकर राजा से विदा ले इच्छानुसार विचरने वाले नारद मुनि वहां से चल दिए। वे काम के वशीभूत हो गये थे। शिव की माया ने उन्हें विशेष मोह में डाल दिया था। वे मुनि मन ही मन सोचने लगे कि मैं इस राजकुमारी को कैसे प्राप्त करूँ?

 

 

 

 

स्वयंवर मे आये हुए नरेशों मे से सबको छोड़कर यह एकमात्र मेरा ही वरण करे यह कैसे संभव हो सकता है? समस्त नारियो को सौंदर्य सर्वथा प्रिय होता है। सौंदर्य को देखकर ही वह प्रसन्नता पूर्वक मेरे अधीन हो सकती है इसमें संशय नहीं है।

 

 

 

 

ऐसा विचारकर काम से विह्वल हुए मुनिवर नारद भगवान विष्णु का रूप ग्रहण करने के लिए तुरंत उनके लोक में जा पहुंचे। वहां विष्णु भगवान को प्रणाम करके वे इस प्रकार बोले – भगवन! मैं एकांत में आपसे अपना सारा वृतांत कहूंगा।

 

 

 

 

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