Tripura Rahasya Pdf Hindi / त्रिपुरा रहस्य Pdf

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Tripura Rahasya Pdf Hindi Download

 

 

 

पुस्तक का नाम  त्रिपुरा रहस्य Pdf
पुस्तक के लेखक  श्री सनातन देव जी महराज 
फॉर्मेट  pdf 
साइज  7 mb 
कुल पृष्ठ  398 
भाषा  हिंदी 
श्रेणी 

 

 

 

Tripura Rahasya Pdf Hindi
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

श्री हरि की माया के द्वारा रचे हुए दोष और गुण श्री हरि के भजन के बिना नहीं जाते। मन में ऐसा विचारकर सब कामनाओ को छोड़कर निष्काम भाव से श्री राम जी का भजन करना चाहिए। हे पक्षीराज! उस कलिकाल में मैं बहुत वर्षो तक अयोध्या में रहा। एक बार वहां अकाल पड़ा तब मैं विपत्ति का मारा विदेश चला गया।

 

 

 

हे सर्पो के शत्रु गरुण जी! सुनिए, मैं दीन, मलिन, दरिद्र दुखी होकर उज्जैन गया। कुछ काल बीतने पर कुछ संपत्ति प्राप्त कर मैं वही भगवान शंकर की आराधना करने लगा। एक ब्राह्मण वेद विधि से शिव जी की पूजा करते थे उन्हें कोई दूसरा काम न था।

 

 

 

 

वह परम साधु और परमार्थ के ज्ञाता थे। वह शंभू के उपासक थे पर हरि की निंदा भी नहीं करते थे। मैं कपट पूर्वक उनकी सेवा करता था। ब्राह्मण बड़े ही दयालु और नीति के भंडार थे। हे स्वामी! बाहर से नम्र देखकर ब्राह्मण मुझे पुत्र की भांति पढ़ाते थे।

 

 

 

 

उन ब्राह्मण श्रेष्ठ ने मुझे शिव जी का मंत्र दिया और अनेक प्रकार से शुभ उपदेश किए। मैं शिव जी के मंदिर में जाकर मंत्र जपता। मेरे हृदय में दंभ और अहंकार बढ़ गया।

 

 

 

मैं नीच जाति का और पापमयी मलिन बुद्धि वाला मोहवश श्री हरि के भक्तो और द्विज जनो को देखते ही ईर्ष्या करने लगता और विष्णु भगवान से द्रोह करता था। गुरु जी मेरे आचरण देखकर दुखी थे। वह मुझे नित्य ही भली-भांति समझाते थे पर मैं कुछ भी नहीं समझता उलटे मुझे खीझ उत्पन्न होती थी। दंभी को कभी नीति अच्छी नहीं लगती है?

 

 

 

एक बार गुरु जी ने मुझे बुलाकर बहुत प्रकार से परमार्थ नीति की शिक्षा दिया कि हे पुत्र! शिव जी की सेवा का फल यही है कि श्री राम जी के चरणों में प्रगाढ़ भक्ति हो। हे तात! शिव जी और ब्रह्मा जी भी श्री राम जी को भजते है फिर नीच मनुष्य की तो बात ही कितनी है?

 

 

 

ब्रह्मा जी और शिव जी जिनके चरणों के प्रेमी है अरे अभागे! उनसे द्रोह करके तू सुख चाहता है? गुरु जी ने शिव जी को हरि का सेवक कहा। यह सुनकर हे पक्षीराज! मेरा हृदय ईर्ष्या से भर गया। नीच जाति का मैं विद्या मिलने से मैं ऐसा हो गया जैसे दूध पिलाने से सांप।

 

 

 

गुरु जी अत्यंत दयालु थे उनको थोड़ा भी क्रोध नहीं होता था। मेरे द्रोह करने पर भी वह बार-बार मुझे उत्तम ज्ञान की ही शिक्षा देते थे। नीच मनुष्य को जहां से बड़ाई मिलती है वह सबसे पहले उसका ही नाश करता है। हे भाई! सुनिए, धूल रास्ते में निरादर से पड़ी रहती है और सब राह चलने वालो से कष्ट सहती रहती है।

 

 

 

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