Vairagya Shatakam Pdf Hindi / वैराग्य शतक Pdf Download

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Vairagya Shatakam Pdf Hindi / वैराग्य शतक Pdf

 

 

पुस्तक का नाम  Vairagya Shatakam Pdf Hindi
पुस्तक के लेखक  भर्तृहरि
भाषा  हिंदी 
श्रेणी  पौराणिक 
फॉर्मेट  Pdf
साइज  8 Mb
पृष्ठ  503

 

 

 

 

Vairagya Shatakam Pdf Hindi
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Vairagya Shatakam Pdf Hindi

 

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

उन लोगो ने फिर कौशल्या जी के चरणों में मस्तक नवाये कौश्ल्या जी ने हर्षित होकर आशीष दिया और कहा तुम मुझे रघुनाथ के समान ही प्रिय हो।

 

 

 

आनंद कंद श्री राम जी अपने महल को चले। आकाश फूलो से व्याप्त हो गया। नगर के स्त्री-पुरुषो के समूह अटारियों पर चढ़कर उनके दर्शन कर रहे है।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

सोने के कलशो को मणि रत्नो से अलंकृत करके सभी लोगो ने अपने दरवाजे पर रख लिया। सब लोगो ने मंगल के लिए वंदनवार, ध्वजा और पताकाये लगाई।

 

 

 

सारी गलियों को सुगंधित द्रव से सींचा गया। गजमुक्ता से रचकर बहुत सी चौक पुराई गयी। अनेक प्रकार के सुंदर मंगल साज सजाये गए और हर्ष पूर्वक नगर में बहुत से डंके बजने लगे।

 

 

 

स्त्रियां जहां-तहां निछावर कर रही है और हर्षित होकर हृदय से आशीर्वाद दे रही है। बहुत सी युवती सौभाग्यवती स्त्रियां सोने के थाल में अनेक प्रकार की आरती सजाकर मंगल गान कर रही है। वह दुखो को हरने वाले और सूर्यकुल रूपी कमल वन को प्रफुल्लित करने वाले सूर्य श्री राम जी की आरती कर रही है।

 

 

 

नगर की शोभा, सम्पत्ति और कल्याण का वेद, शेष जी और सरस्वती जी वर्णन करते है। परन्तु वह भी यह चरित्र देखकर ठगे से रह जाते है। शिव जी कहते है कि हे उमा! तब मनुष्य भला उनके गुणों को कैसे कह सकते है।

 

 

 

दोहा का अर्थ-

 

 

 

स्त्रियां कुमुदिनी है, अयोध्या सरोवर है और श्री रघुनाथ का विरह सूर्य है। इस विरह सूर्य के ताप से वह मुरझा गयी थी। अब उस विरह रूपी सूर्य के अस्त होने पर श्री राम रूपी पूर्ण चंद्र को निरखकर खिल उठी।

 

 

 

अनेक प्रकार के शुभ शकुन हो रहे है। आकाश में नगाड़े बज रहे है। नगर के पुरुषो और स्त्रियों को दर्शन द्वारा कृतार्थ करके भगवान श्री राम जी महल को चले।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

शिव जी कहते है कि हे भवानी! प्रभु ने जान लिया कि माता कैकेयी लज्जित हो गयी है। इसलिए वह पहले उनके महल में ही गए और उन्हें समझाकर बहुत सुख दिया। फिर हरि ने अपने महल को गमन किया। कृपा के समुद्र श्री राम जी जब अपने महल को गए तब नगर के स्त्री-पुरुष सब सुखी हुए।

 

 

 

गुरु वशिष्ठ जी ने ब्राह्मणो को बुला लिया और कहा – आज शुभ घड़ी है, सुंदर दिन आदि सभी शुभ योग है। अब सब ब्राह्मण हर्षित होकर आज्ञा दीजिए जिसमे श्री राम जी सिंहासन पर विराजमान हो।

 

 

 

वशिष्ठ जी के सुहावने वचन सुनकर सभी ब्राह्मणो को बहुत अच्छे लगे। वह सब अनेक ब्राह्मण कोमल वचन कहने लगे कि श्री राम जी का राज्याभिषेक सम्पूर्ण जगत को आनंद देने वाला है। हे मुनि श्रेष्ठ! अब विलम्ब न करिये और महाराज का शीघ्र तिलक कीजिए।

 

 

 

दोहा का अर्थ-

 

 

 

तब मुनि ने सुमंत्र जी से कहा वह सुनते ही हर्षित होकर चले। उन्होंने तुरंत ही जाकर अनेक रथ, घोड़े और हाथी सजाये और सूचना देने वाले दूतो को जहां-तहां भेजकर मांगलिक वस्तुए मंगाकर फिर हर्ष के साथ आकर वशिष्ठ जी के चरणों में सिर नवाया।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

अवधपुरी को बहुत ही सुंदर सजाया गया। देवताओ ने पुष्पों की वर्षा की झड़ी लगा दी। श्री राम जी ने सेवको को बुलाकर कहा – तुम लोग जाकर पहले मेरे सभी सखा को स्नान कराओ।

 

 

 

भगवान के वचन सुनते ही सेवक जहां-तहां दौड़े और तुरंत ही उन्होंने सुग्रीव आदि को स्नान कराया। फिर करुणा निधान श्री राम जी ने भरत जी को बुलाया और अपने हाथो से उनकी जटाओ को सुलझाया।

 

 

 

तदनन्तर भक्त वत्सल कृपालु प्रभु श्री रघुनाथ जी ने तीनो भाइयो को स्नान कराया। भरत जी का भाग्य और प्रभु की कोमलता का वर्णन शतकोटि शेष जी भी नहीं कर सकते है।

 

 

 

फिर श्री राम जी ने अपनी जटाये खोली और गुरु जी से आज्ञा मांगकर स्नान किया। स्नान करके प्रभु ने आभूषण धारण किए। उनके सुशोभित अंगो को देखकर असंख्य कामदेव भी लज्जित हो गए।

 

 

 

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