Vedi Pujan Paddhati Pdf | वेदी पूजन पद्धति Pdf

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Vedi Pujan Paddhati Pdf 

 

 

 

 

 

 

 

विक्रमपुर गांव बहुत ही सुखी और संपन्न गांव था। विक्रमपुर रातो रात ही सुखी और संपन्न नहीं हुआ था। उसकी सम्पन्नता में कई पीढ़ी के मुखिया का अथक परिश्रम और प्रयास था।

 

 

 

 

लेकिन जो वर्तमान में विक्रमपुर का मुखिया था। वह गांव की सम्पन्नता में कम और अहंकार की परिपूर्णता में अधिक ध्यान देता था। उसने कुछ ऐसे नियम बना दिए थे कि उसके जीवित रहते कोई अन्य मुखिया बन ही नहीं सकता था।

 

 

 

 

 

वह अपने घर के बाहर जाकर बैठ जाता था और अपने हाथ में एक डंडा रखता था। मुखिया रास्ते से गुजरने वाले हर व्यक्ति को चाहे वह किसी भी उम्र का हो सभी को एक डंडा अवश्य ही मारता था।

 

 

 

 

 

मुखिया ने अपने घर के सामने एक सुंदर सी फुलवारी लगवा रखा था। फुलवारी में तरह-तरह के रंग बिरंगे और सुगन्धित फूल खिले रहते थे। फुलवारी की देखभाल के लिए मुखिया ने एक माली का प्रबंध किया था।

 

 

 

 

जब भी माली फूलो की देखभाल के लिए आता था। तब उसे मुखिया गिनकर सात डंडे अवश्य ही मारता था। इस तरह मुखिया बहुत प्रसन्न होता था। मुखिया विघ्न संतोषी था पर पीड़ा में उसे ख़ुशी मिलती थी।

 

 

 

 

विक्रमपुर गांव के सभी लोग उस क्रूर मुखिया से बहुत तंग आ चुके थे। लेकिन मुखिया के पास असीमित अधिकार होने के कारण कोई भी उसका विरोध करने का साहस नहीं जुटा पाता था।

 

 

 

 

यद्यपि सभी लोगो में मुखिया के प्रति भारी असंतोष व्याप्त था। धीरे-धीरे कई वर्ष बीतते गए मुखिया अब वृद्ध हो चला था। तथापि उसकी आदत में कोई भी सुधार नही हुआ और न ही सुधार होने की कोई संभावना थी।

 

 

 

 

सभी लोग अपने घर परिवार के प्यार में इतना उलझ जाते है कि उन्हें पता ही नहीं लगता कि सब कुछ यही पर छोड़ना पड़ेगा। एक मृत्यु ही तो है जो सबको अपने साथ अवश्य ही लेकर जाती है।

 

 

 

 

 

वह मृत्यु लोक के सभी प्राणियों से इतना ज्यादा प्यार करती है कि इस मृत्यु लोक के हर प्राणी को अपने साथ और अपने पास रखने के लिए उतावली रहती है।

 

 

 

 

 

इस तरह वह निर्दयी मुखिया को भी मृत्यु एक दिन अपने साथ ले गई। मुखिया की मृत्यु का समाचार सुनते ही विक्रमपुर के सभी नागरिक ख़ुशी से झूमते हुए गाने बाजे के साथ ही मुखिया के घर के बाहर एकत्रित हो गए और मुखिया की अंतिम यात्रा की तैयारी धूम-धाम से करने में लग गए।

 

 

 

 

 

मुखिया को खूब इत्र गुलाब से नहलाकर फूलो का हार पहनाया गया। फिर उसे चार चार लोग उसके शव को गाड़ी में रखकर श्मशान घाट ले गए।

 

 

 

 

प्रत्येक लोग इतने खुश थे कि उन्हें मानो नई जिंदगी मिल गई थी। किसी भी मृतक को एक पाव भी घी नसीब नहीं होता है लेकिन उस मुखिया को लोग सैकड़ो मटके घी से सरावोर कर दिया।

 

 

 

 

ऐसा इसलिए कि उस ‘महादुष्ट मुखिया’ की प्रताड़ना से सब लोग आजाद हो गए थे। सैकड़ो कुंतल लकड़ियों पर मुखिया का पार्थिव शरीर रखा गया और सभी लोगो ने नाच गाने के मध्य ही मुखिया की चिता को अग्नि के हवाले कर दिया।

 

 

 

 

सभी के मन में यह विचार था कि उस दुष्ट मुखिया का एक भी निशान शेष नहीं रहना चाहिए। मुखिया का एक लड़का था, वह बहुत ही ईमानदार था। उसने अपने पिता के बनाए हुए सभी नियम निरस्त कर दिए थे।

 

 

 

 

सभी गांव के लोग सबकी सहमति से मुखिया के लड़के को विक्रमपुर का नया मुखिया बना दिया था। मुखिया के मरने के बाद उसका माली बहुत जोर-जोर से रोने लगा।

 

 

 

 

तब नए मुखिया ने माली से पूछा, “क्या तुम्हे पुराने मुखिया के मरने पर प्रसन्नता नहीं हुई ?”

 

 

 

 

तब माली ने नए मुखिया से कहा, “हमे पुराने मुखिया के मरने पर खूब प्रसन्नता हुई। लेकिन मैं इसलिए रो रहा हूँ कि अगर वह फिर मनुष्य के रूप में जन्म लेकर किसी तरह यहां आ गया तो हम सभी लोगो को फिर पहले की तरह सताएगा।”

 

 

 

 

उसी समय एक बुजुर्ग सज्जन ने कहा, “कि ऐसी मान्यता है कि जिस मनुष्य के पाप कर्म ज्यादा होते है। उस पाप कर्म के बोझ से दबकर मनुष्य की आत्मा एकदम लघु से लघुतर हो जाती है। जिस कारण उस लघु से लघुतर आत्मा को कीट पतंगो का जीवन प्राप्त होता है और जिसके कर्म अच्छे होते है तो उस अच्छे कर्म के कारण स्वरुप उस मनुष्य की आत्मा का पूर्ण विस्तार होकर वापस मनुष्य का जीवन प्राप्त होता है।”

 

 

 

 

 

उस बुजुर्ग की बात सुनकर माली खुश हो गया। उसे विश्वास हो गया कि अब दुष्ट मुखिया को मनुष्य का जीवन दुबारा मिलना संभव नहीं है। विक्रमपुर गांव के सभी लोग अपने नए मुखिया से खुश थे।

 

 

 

 

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