Yamal Tantra Pdf / यामल तंत्र Pdf Download

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

नियमपूर्वक इस श्रेष्ठ  कथा को सुनने से बिना किसी विघ्न बाधा के उत्तम फल की प्राप्ति होती है। जो लोग दीक्षा से रहित है उनका कथा श्रवण में अधिकार नहीं है। अतः मुने! कथा सुनने की इच्छा वाले लोगो को पहले वक्ता से दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए।

 

 

 

 

जो लोग नियम से कथा सुने, उनको  ब्रह्मचर्य से रहना, भूमि पर सोना, पत्तल में खाना और प्रतिदिन कथा समाप्त होने पर ही अन्न ग्रहण करना चाहिए। जिसमे शक्ति हो, वह पुराण की समाप्ति तक उपवास करके शुद्धता पूर्वक भक्ति भाव से उत्तम शिव पुराण को सुने।

 

 

 

 

इस कथा का व्रत लेने वाले पुरुष को प्रतिदिन एक ही बार हैविव्यान्न भोजन करना चाहिए। जिस प्रकार से  कथा श्रवण का नियम सुख पूर्वक सध सके वैसे ही  करना चाहिए। गरिष्ठ अन्न, जला अन्न, दाल, मसूर, सेम, भवदूषित और बासी अन्न को  खाकर कथा व्रती पुरुष कभी कथा को सुने।

 

 

 

 

जिसने कथा का व्रत ले रखा हो। वह पुरुष लहसुन, प्याज, गाजर, हींग, मादक वस्तु और आमिष कही जाने वाली वस्तुओ को त्याग दे। कथा का व्रत लेने वाला पुरुष क्रोध, काम आदि छ्ह विकारो को ब्राह्मणो की निंदा को तथा पतिव्रता भी त्याग दे।

 

 

 

 

कथा व्रती पुरुष शौच, सत्य, दया, सरलता, मौन, विनय और हार्दिक उदारता इन सद्गुणों को सदा अपनाये रहे। श्रोता निष्काम हो या सकाम वह नियम पूर्वक कथा सुने। सकाम पुरुष अपनी अभीष्ट कामना को प्राप्त करता है और निष्काम पुरुष मोक्ष पा लेता है।

 

 

 

 

दरिद्र क्षय का रोगी, पापी, भाग्यहीन और संतान रहित पुरुष भी इस उत्तम कथा को सुने। काक बंध्या आदि जो सात प्रकार की स्त्रियां है वह इन सभी को शिव पुराण की उत्तम कथा सुननी चाहिए। मुने! स्त्री हो या पुरुष सबको यत्नपूर्वक विधि-विधान से शिव पुराण की यह उत्तम कथा सुननी चाहिए।

 

 

 

 

महर्षे! इस तरह शिव पुराण की कथा पाठ और श्रवण संबंधी यज्ञोत्सव की समाप्ति होने पर श्रोताओ को भक्ति एवं प्रयत्न पूर्वक भगवान शिव की पूजा की भांति पुस्तक की भी पूजा करनी चाहिए। तदनन्तर विधि पूर्वक वक्ता का भी पूजन करना आवश्यक है।

 

 

 

 

पुस्तक को आच्छादित करने के लिए नवीन एवं सुंदर बस्ता बनावे और उसे बाँधने के लिए दृढ एवं दिव्य डोरी लगावे। फिर उसका विधिवत पूजन करे। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार महान उत्सव के साथ पुस्तक और वक्ता की विधिवत पूजा करके वक्ता की सहायता के लिए स्थापित हुए पंडित का भी उसी के अनुसार धन आदि के द्वारा उससे कुछ ही कम सत्कार करे।

 

 

 

 

वहां आये हुए ब्राह्मणो को अन्न धन आदि का दान करे। साथ ही गीत, नित्य और बाद्य आदि के द्वारा महान उत्सव रचाये। मुने! यदि श्रोता विरक्त हो तो उसके लिए कथा समाप्ति के दिन विशेष रूप से उस गीता का पाठन करना चाहिए जिसे श्री रामचंद्र जी के प्रति भगवान शिव ने कहा था।

 

 

 

 

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